
सनातन धर्म में किसी भी एकादशी तिथि का विशेष महत्व है और इनमें से एक प्रमुख व्रत है जया एकादशी का। यह व्रत माघ महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है और इसे पापों के नाश और पुण्य के लिए सर्वोत्तम दिन माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की भक्ति, उपवास और कथा सुनने से जीवन के सभी दुख, भय, ऋण और कठिनाइयों से मुक्ति मिलती है। जया एकादशी का व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है जो अपने जीवन में समस्याओं का सामना कर रहे हैं। यही नहीं मान्यता यह भी है कि इस व्रत को करने से व्यक्ति को पिशाच योनि से मुक्ति मिलती है। इस दिन व्रत करने के साथ एकादशी व्रत कथा का पाठ करना भी शुभ माना जाता है और इस व्रत कथा के पाठ से ही पूजा और व्रत का पूर्ण फल मिलता है। आइए जानें जाया एकादशी की व्रत कथा के बारे में यहां विस्तार से।
एक बार की बात है स्वर्ग लोक में देवराज इंद्र पारिजात वृक्षों से सुशोभित वन में विहार कर रहे थे। अपने आप को प्रसन्न करने के लिए इंद्र ने वहां नृत्य और संगीत का आयोजन किया था। चित्रसेन नाम के एक संगीतकार अपनी अर्धांगिनी मालिनी और अपने पुत्र माल्यावन के साथ वहां संगीत का कार्यक्रम प्रस्तुत कर रहे थे। उसी स्थान पर पुष्प दूध की पुत्री पुष्पावती भी उपस्थित थी तो। उसी समय ऐसा हुआ कि पुष्पवती और मूल्यवान एक दूसरे को देखते ही मोहित हो गए। वो दोनों ही एक दूसरे के रूप और सौंदर्य के प्रति इतने आकर्षित हुए कि संगीत का कार्यक्रम भी ध्यानपूर्वक प्रस्तुत नहीं कर सके। यह देख देवराज इंद्र इतने क्रोधित हुए कि उन्होंने पुष्पवती और माल्यवान को श्राप दिया कि तुमने मेरी सेवा में बाधा डाली है मैं तुमसे बहुत ज्यादा अप्रसन्न हूं।अब तुम दोनों पिशाच योनि धारण करके पृथ्वी लोक पर अपने अपराध की सजा काटोगे। ऐसे भीषण श्राप के कारण वे दोनों अत्यंत पीड़ा उठाते हुए पृथ्वी लोक पर हिमालय में अपना दंड भुगतने लगे। उनकी विवशता कुछ ऐसी थी की वो ना तो कुछ स्पर्श कर पा रहे थे और ना ही उन्हें किसी भी प्रकार की गंध का आभास हो रहा था।
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हिमालय पर्वत पर सर्दी से ठिठुरते हुए बहुत ही कष्ट में वो अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे। एक दिन अत्यंत दुखी होकर वे एक दूसरे से कहने लगे कि पता नहीं हमने पिछले जन्म में ऐसे कौन से कर्म किए नहीं जिनका हमें ऐसा फल मिल रहा है और हमें इतना पाप भुगतना पड़ रहा है। पता नहीं हमसे ऐसा कौन सा अपराध हुआ है ? सुना है कि नरक में बहुत ही यातनाएं भुगतनी पड़ती है किंतु जो यातनाएं हम अभी सह रहे हैं यह नरक की आत्माओं से भी कई गुना ज्यादा अधिक है। इसलिए अब हमें हर प्रकार के पाप से बच कर रहना चाहिए और इस स्थिति से जल्द से जल्द मुक्त होने का प्रयास करना चाहिए। सौभाग्यवश माघ महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि आई और उस दिन उन्होंने भोजन नहीं किया। उनके शरीर में इतनी शक्ति भी नहीं थी की वो चल पाएं और वह एक पीपल के वृक्ष के नीचे गिर पड़े। पूरी रात उन्होंने उसी वृक्ष के नीचे बिना भोजन और पानी के काटी। अनजाने में उन्होंने एकादशी का व्रत कर लिया और भगवान विष्णु की कृपा से द्वादशी के दिन उन्हें एकादशी व्रत का पूर्ण फल भी प्राप्त हुआ। उसके शुभ परिणाम से दोनों को पिशाच योनि से मुक्ति मिल गई और वो एक बार पुनः देव योनि प्राप्त कर सुंदर आभूषण और हर तरह के श्रृंगार से शोभित होकर स्वर्ग लोक को लौट गए।
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स्वर्ग में इंद्र ने पुष्पवती और माल्यवान से पूछा कि आपने ऐसे कौन से पुण्य किए जिससे आपको सभी श्रापों से मुक्ति मिल गई। दोनों ने इंद्र को बताया कि उन्होंने भगवान श्री कृष्ण की पूजा और उपासना की है और साथ ही, जया एकादशी का व्रत भी पूरी श्रद्धा के साथ रखा, जिससे उन्हें पिशाच योनि से मुक्ति मिल गई। उस समय इंद्र ने कहा कि अब वो उनके लिए भी पूजनीय हो गए हैं। श्री कृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि जो व्यक्ति इस व्रत का श्रद्धा पूर्वक पालन करता है और सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है और कभी भी वो पिशाच योनि में नहीं जाता है।
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यदि आप भी जया एकादशी के दिन यहां बताई व्रत कथा का पाठ करेंगी तो आपको सभी पापों से मुक्ति मिलने के साथ उसके ऊपर भगवान विष्णु की कृपा भी बनी रहती है।
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