
आजकल एक नया टर्म सामने आया है, जिसका नाम है प्रेशर कुकर पेरेंटिंग। ये बेहद ही दबाव और तनाव में की जाती है। माता पिता बच्चों पर उम्मीदों का इतना दबाव बना देते हैं कि बच्चे इतने डिप्रेशन में चले जाते हैं कि उन्हें समझ ही नहीं आता कि उन्हें क्या करना है। जिस प्रकार कुकर में भाप बनती है उसी प्रकार बच्चों के दिमाग में भी परफॉर्मेंस का प्रेशर बढ़ता रहता है और जब वह भाप नहीं निकलती तो बच्चों का दिमाग भी फट जाता है। ऐसे में ये जानना तो बनता है कि प्रेशर कुकर पेरेंटिंग क्या है, ऐसे में इसे विस्तार में समझते हैं। आज का हमारा लेख इसी विषय पर है। आज हम आपको अपने इस लेख के माध्यम से बताएंगे कि प्रेशर कुकर पेंटिंग क्या है और कैसे इसका नेगेटिव इंपैक्ट बच्चों पर पड़ सकता है। इसके लिए हमने कोच और हीलर, लाइफ अल्केमिस्ट, साइकोथेरेपिस्ट डॉ. चांदनी तुगनैत (Dr. Chandni Tugnait) से भी बात की है। पढ़ते हैं आगे...
बता दें कि जब बच्चों को यह महसूस कराया जाए कि उनका प्यार और महत्व केवल उनके नंबर और ग्रेडस् पर निर्भर करता है तो इससे बच्चों के दिमाग में एक प्रेशर बढ़ने लगता है।-1770981908884.jpg)
वह हर वक्त यह सोचते रहते हैं कि किस प्रकार से नंबर लेकर आएं। वह अपनी निजी जिंदगी में खेल कूद भूल जाते हैं, वे धीरे-धीरे एंजायटी का शिकार होने लगते हैं, डिप्रेशन के भी शिकार हो जाते हैं। उनका स्वभाव बदलने लगता है, साथ ही बच्चा खुश रहने की बजाय चिंता में डूबने लगता है और वहीं अगर वह फर्स्ट नहीं आया तो उसके दिमाग में एक अलग ही रोग पैदा हो जाता है कि वह कुछ भी नहीं कर सकता।
जब इस प्रकार का माहौल पैदा हो जाता है और यदि बच्चा आपकी उम्मीदों पर नहीं खड़ा उतर पाता तो वह झूठ बोलना शुरू कर देता है। नतीजा यह होता है कि बच्चे रिस्क लेना बंद कर देते हैं और उन्हें हर चीज में झूठ बोलना पड़ता है। माता-पिता की डांट से बचने के लिए उन्हें यही एक मात्र सहारा लगता है।
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जब बच्चा कुछ अच्छा नहीं कर पाता तो माता-पिता उसकी दूसरों से तुलना करने लग जाते हैं। ऐसे में उसके अंदर क्रिएटिविटी की कमी हो जाती है और वह खुद को दूसरों से कम आंकना शुरू कर देता है।
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इसके अलावा प्रेशर कुकर पेरेंटिंग माता-पिता और बच्चे के बीच में दूरी पैदा कर देती है। यह पेंटिंग एक बड़ी खाई की तरह होती है। बचपन में बेफिक्र रहने की उम्र में जब बच्चा स्कूल, ट्यूशन और एक्स्ट्रा क्लासेस के प्रेशर में लग जाते हैं तो वह थक जाते हैं। ऐसे में बच्चे जवानी तक पहुंचते पहुंचते अपने मन में नेगेटिविटी को पैदा कर लेते हैं।
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