
'फेमिनिज्म' आज बेशक हम इस शब्द से वाकिफ हैं और महिलाओं के हक, सम्मान और उनके स्पेस को लेकर खुलकर बात होने लगी है, लेकिन एक वक्त पर ऐसा नहीं था। महिलाओं को अपने हक के लिए बोलने तो क्या, अपने बारे में सोचने की भी आजादी नहीं थी। बाल विवाह, दहेज, घरेलू हिंसा और बेमेल विवाह जैसी न जाने कितनी ऐसी चीजें थीं, जिनके चलते महिलाएं अपना वजूद तक खोती जा रही थीं, पर फिर भी अपने लिए आवाज नहीं उठा पा रही थीं। उस वक्त पर सामाजिक बंदिशों को तोड़ते हुए एक महिला ने अदालत का दरवाजा खटखटाया, बाल विवाह के खिलाफ आवाज उठाई और अपने हक के लिए महारानी विक्टोरिया को भी चिट्ठी लिख डाली। चलिए आपको बताते हैं कौन थीं ये महिला?
We honour the legacy of Rukhmabai Raut, India’s first qualified physician.
— Congress (@INCIndia) September 25, 2025
Her fight for a divorce from her unwanted marriage became a major cause behind the enactment of the Age of Consent Act, 1891, which later led to the eradication of child marriage by law in India. pic.twitter.com/fPNmR3ZYWd
रुक्माबाई राउत का नाम और इनकी कहानी, हर महिला को पता होनी चाहिए। रुक्माबाई का जन्म मुंबई में हुआ था और जब वो 2 साल की थीं, तभी उनके पिता का निधन हो गया और उनकी मां ने दोबारा शादी कर ली। जब रुक्माबाई केवल 11 साल की थीं, तब उनके दादा ने उनकी भी शादी कर दी। उस वक्त उनके पति की उम्र 19 साल की थी। ये शादी उस उम्र में की गई थी, जब उन्हें शादी के बारे मे समझ भी नहीं थी। हालांकि, रुक्माबाई की मां और उनके सौतेले पिता ने उन्हें उनके पति के पास नहीं भेजा और वो अपनी पढ़ाई करती रहीं, लेकिन 1884 में रुक्माबाई के पति जब 29 साल के हुए, तो उन्होंने रुक्माबाई पर वैवाहिक अधिकार का केस फाइल कर दिया और अदालत से मांग की कि रुक्माबाई उनके पास रहने आएं, लेकिन रुक्माबाई ने ऐसा करने से मना कर दियाय, इसके बाद कोर्ट ने उनसे कहा कि या तो वो अपने पति के घर जाएं या उन्हें 6 महीने जेल में रहना होगा, लेकिन रुक्माबाई ने कहा कि वो बेमेल और जबरदस्ती की शादी में रहने के बजाय जेल जाना पसंद करेंगी।
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रुक्माबाई के तलाक के केस में जज ने फैसला उनके पति के हक में सुनाया, लेकिन रुक्माबाई ने हार नहीं मानी और क्वीन विक्टोरिया को एक खत लिखा। इस खत में उन्होंने अपनी बात रखी कि कैसे छोटी उम्र में बिना उनकी सहमति के उनकी शादी कर दी गई थी, पर अब वो समझदार हैं और अपने रास्ते खुद चुन सकती हैं, ऐसे में वो इस शादी से आजाद होना चाहती हैं। इस खत के बाद क्वीन विक्टोरिया ने जज के फैसले को खारिज कर दिया। ये मामला एक दूसरे जज तक पहुंचाया गया है और फिर रुक्माबाई का तलाक हुआ और उनके पति को उन्हें हर्जाना भी देना पड़ा।
रुक्माबाई पढ़ाई में हमेशा से अच्छी थीं और तलाक के बाद उन्होंने इंग्लैंड जाकर पढ़ाई की। वो साल 1889 में इंग्लैंड गईं और लंदन स्कूल ऑफ मेडिसिन फॉर विमेन से डॉक्टर बनकर वापस भारत लौटीं। उस वक्त किसी महिला का विदेश जाकर पढ़ना या डॉक्टर बनना आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने अपनी हिम्मत से ऐसा कर दिखाया। वो भारत की पहली प्रेक्टिसिंग महिला डॉक्टर बनीं। उनके केस की वजह से बाल विवाह और महिलाओं के अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा शुरू हुई।
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