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सभी महिलाओं के लिए करवा चौथ का व्रत हो कानूनन जरूरी...हाईकोर्ट ने इस याचिका पर दिया करारा जवाब, आखिर कब तक देश की बेटियों पर थोपी जाएंगी ऐसी शर्तें?

हमारे देश में महिलाओं के लिए कई ऐसे कानून बनाए गए हैं जो उनके हित में होने के साथ उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं, लेकिन क्या ऐसी बात करना ठीक है कि सभी महिलाओं के लिए करवाचौथ व्रत करना अनिवार्य होना चाहिए।
Editorial
Updated:- 2025-01-27, 14:27 IST

हम एक ऐसे समाज का हिस्सा हैं जहां नारी को माता दुर्गा का दर्जा दिया जाता है और उसकी पूजा करने की बात भी की जाती है। यही वो देश है जहां सावित्री अपने पति की रक्षा के लिए यमराज से भी लड़ जाती है। न जानें कितनी ऐसी परम्पराएं हैं जो आज भी देश की बेटियों पर लागू होती हैं। करवा चौथ का व्रत हो या हरतालिका तीज का पूजन, महिलाएं व्रत उपवास करके पति की दीर्घायु के लिए व्रत करती हैं और ईश्वर से कामना करती हैं कि उनके सुहाग की रक्षा हो। हालांकि, आज जब हम आजाद भारत का हिस्सा हैं तो ये हमारी इच्छा पर ही निर्भर होना चाहिए कि हम कौन सा व्रत करें और कौन सा नहीं। जब बात करवा चौथ की होती है तो ये पति-पत्नी के पवित्र रिश्ते को मजबूत बनाने का एक जरिया माना जाता है। फिर भला इस व्रत को किसी पर थोपना कहां की समझदारी है? क्या जो पत्नियां किसी वजह से व्रत नहीं कर पा रही हैं उनका रिश्ता अच्छा नहीं है? क्या ये रीति-रिवाज सिर्फ इसलिए महिलाओं को निभाने चाहिए क्योंकि ये सदियों से हमारी परंपरा का हिस्सा हैं?क्या महिलाओं को उनकी मर्जी के बिना भी कोई भी व्रत करने के लिए मजबूर करना ठीक है?

हाल ही में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसमें शादीशुदा,लिव इन में या फिर विधवा किसी भी महिला को करवा चौथ का व्रत रखने के लिए नियम बनाने की याचिका दायर की गई। हालांकि इस जनहित याचिका को पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने जुर्माने के साथ वापस लेते हुए खारिज कर दिया है। अब सवाल यह उठता है कि आखिर कब तक महिलाओं पर ऐसे क़ानून थोपे जाएंगे जो उनकी मर्जी के खिलाफ हों? क्या एक पुरुष को यह तय करने का अधिकार होना चाहिए कि महिलाओं के लिए कौन से कानून बनने चाहिए? क्या देश की बेटियों को ये अधिकार नहीं होना चाहिए कि वो अपनी जिंदगी के फैसले खुद ही ले सकें?

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने करवा चौथ को अनिवार्य बनाने की जनहित याचिका की खारिज

is karwa chauth compulsary for women

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक जनहित याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें महिलाओं के लिए उनकी वैवाहिक स्थिति की परवाह किए बिना करवा चौथ व्रत को अनिवार्य करने के लिए एक कानून बनाने की मांग की गई थी। मुख्य न्यायाधीश शील नागू और न्यायमूर्ति सुमीत गोयल की खंडपीठ ने इस याचिका पर 1,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया।

हाई कोर्ट के 22 जनवरी, 2025 के आदेश के अनुसार, याचिकाकर्ता ने महिलाओं के कुछ समूहों, खासतौर पर विधवाओं के खिलाफ भेदभाव के बारे में चिंता जताई, जिन्हें पारंपरिक रूप से करवा चौथ में भाग लेने से बाहर रखा गया है। याचिकाकर्ता ने एक ऐसे कानून के लिए तर्क दिया जिसमें सभी महिलाओं को, वैवाहिक स्थिति की परवाह किए बिना, त्योहार के अनुष्ठानों का पालन करने की छूट मिले। यही नहीं इसमें करवा चौथ का व्रत भी उन महिलाओं को भी रखने की बात कही गई जो विधवा हों या लिव इन में रहती हों। यही नहीं इस बात की याचिका भी दी कि जो इस कानून का पालन न करे उसको सजा दी जाए।

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हाई कोर्ट ने याचिका पर लगाया 1000 रुपये का जुर्माना  

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने करवा चौथ जैसे अनुष्ठानों में सभी महिलाओं, जिनमें विधवा, तलाकशुदा और लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाएं शामिल हैं, की अनिवार्यता की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर 1,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया और यह भी कहा, 'यह विषय पूरी तरह से विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है, इसलिए इस मामले में कोर्ट हस्तक्षेप करने से इनकार करता है।'

मुख्य न्यायाधीश शील नागू और न्यायमूर्ति सुमित गोयल की खंडपीठ ने आदेश दिया, 'याचिका को वापस लिया गया मानते हुए खारिज किया जाता है। याचिकाकर्ता को 1,000 रुपये का प्रतीकात्मक जुर्माना पीजीआईएमईआर, चंडीगढ़ के 'गरीब मरीज कल्याण कोष' में जमा करना होगा।'
इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सतीश चौधरी ने पैरवी की, जबकि उत्तरदाताओं की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सत्यपाल जैन ने पक्ष रखा।
अदालत द्वारा याचिका पर विचार करने की अनिच्छा स्पष्ट करने के बाद याचिकाकर्ता के वकील ने मामला वापस लेने का अनुरोध किया। इस मामले से बाहर निकलने की अनुमति देते हुए कोर्ट ने 1,000 रुपये का जुर्माना लगाया।

विधवा महिलाओं के लिए रखी गई थी करवाचौथ की मांग  

karwa chauth for widow women

हाल ही में पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी, जिसमें विधवा महिलाओं के लिए भी करवा चौथ व्रत रखने की मांग की गई थी। इस याचिका में कहा गया कि इस पर्व को एक उत्सव की तरह मनाना चाहिए और इसे विधवा, तलाकशुदा या लिव इन में रहने वाली महिलाओं के लिए भी अनिवार्य करना चाहिए। यह मांग वास्तव में बहुत अजीब थे और इसे सुनकर अदालत ने इसे पूरी तरह से अस्वीकृति दे दी है।

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क्या परंपरा के नाम पर महिलाओं पर ऐसे शर्तें लगाना ठीक है?

करवा चौथ महिलाओं के लिए एक महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है और इस दौरान सभी पत्नियां अपने पतियों की दीर्घायु की कामना करती हैं। पूरे दिन निर्जला व्रत करने के बाद वो चांद की पूजा करने के बाद व्रत तोड़ती हैं। आमतौर पर यह शादीशुदा महिलाओं का पर्व माना जाता है। हालांकि, यह सवाल उठता है कि क्या ऐसी परंपराएं सिर्फ महिलाओं के लिए ही होनी चाहिए?

जब हमारे समाज में पुरुषों पर इस तरह के नियमों या परंपराओं का पालन करने का दबाव नहीं डाला जाता है, तो महिलाओं को ही रूढ़िवादी परंपराओं का पालन करने के लिए क्यों बाध्य किया जाता है? क्या यह समानता के अधिकारों का उल्लंघन नहीं है?

परंपराएं समाज के सांस्कृतिक ताने-बाने का हिस्सा होती हैं, लेकिन यह भी जरूरी है कि उन्हें महिलाओं और पुरुषों के बीच भेदभाव पैदा करने का माध्यम न बनाया जाए। वास्तव में देखा जाए तो महिलाओं को अपनी मर्जी से परंपराओं को अपनाने या नकारने की आजादी होनी चाहिए। इस पुरुष प्रधान समाज को यह समझने की जरूरत है कि किसी भी परंपरा को थोपने के बजाय उसमें सभी की स्वीकृति और समानता सुनिश्चित हो।

महिलाओं के लिए कोई भी कानून बनाने का अधिकार पुरुषों को किसने दिया है?

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अगर हम भारत में किसी भी कानून की बात करें तो यह अधिकार भला पुरुषों को कौन देता है कि वो महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर कानून की मांग करें। करवा चौथ व्रत को अनिवार्य बनाने की यह याचिका वास्तव में उस समाज के पुरुषों के लिए एक प्रश्न चिह्न है जो महिलाओं की हर क्षेत्र में भागीदारी का डंका बजाते हैं। पुरुषों को कोई अधिकार नहीं होना चाहिए कि वो कोई भी ऐसा कानून बनाएं या उसकी मांग करें जो महिलाओं को किसी भी चीज के लिए बाध्य करता हो। परंपरा हो या जीवन जीने का तरीका, हर महिला को पूरा अधिकार है कि वो अपनी मर्जी से फैसले ले। करवा चौथ का व्रत भी उनकी अपनी पसंद पर ही निर्भर होना चाहिए, न कि किसी क़ानून का हिस्सा।

वास्तव में इस खबर ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आजाद भारत में आखिर कब महिलाओं को मिलेगी आजादी? आपकी इस बारे में क्या राय है, हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। आपको यह स्टोरी अच्छी लगी हो तो इसे फेसबुक पर शेयर और लाइक जरूर करें। इसी तरह और भी आर्टिकल पढ़ने के लिए जुड़े रहें हरजिंदगी से।

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