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Maha Kumbh 2025: 1881 से अब तक 144 सालों में कितना बदला महाकुंभ का स्वरूप, AI ने दिखाईं कुछ रोचक तस्वीरें

क्या आपने कभी सोचा है कि 1881 में महाकुंभ कैसा दिखता होगा? 144 सालों में इस भव्य आयोजन का स्वरूप कितना बदल गया होगा? क्या उस समय भी सुरक्षा व्यवस्था इतनी जटिल थी? हमने महाकुंभ की कुछ दुर्लभ तस्वीरें और जानकारियां ढूंढी हैं, जो आपके लिए जानना बेहद रोचक होगा।
Editorial
Updated:- 2025-01-22, 18:27 IST

महाकुंभ मेला भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख और ऐतिहासिक धार्मिक आयोजन है, जो हर 12 साल में प्रयागराज, उत्तर प्रदेश में आयोजित होता है। इस मेले का आयोजन एक विशेष तिथि और समय पर किया जाता है। खासतौर पर यह मेला सूर्य के उत्तरायण होने पर लगता है। जब इस मेले को लगते हुए 144 साल पूर्ण हो जाते हैं तब यह पूर्ण महाकुंभ कहलाता है। साल 2025 का महाकुंभ मेला इसलिए भी ख़ास है क्योंकि 1881 से लेकर 2025 तक 12 बार महाकुंभ का आयोजन हो चुका है और इसी वजह से इस साल पूर्ण महाकुंभ का आयोजन हुआ है। इस दौरान लाखों श्रद्धालु गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम में स्नान करने के लिए एकत्र होते हैं। महाकुंभ का आयोजन 1881 से अब तक कई बदलावों के साथ हुआ है। जिसमें प्रशासनिक व्यवस्था से लेकर श्रद्धालुओं की संख्या और आयोजन के तकनीकी पहलुओं तक कई महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं।

2025 में महाकुंभ का आरंभ एक नए रूप में हुआ है जिसमें अत्याधुनिक तकनीक और बेहतर प्रशासनिक व्यवस्था देखने को मिल रही है। अगर हम इस महाकुंभ के मुख्य आकर्षण की बात करें तो डिजिटल युग का यह कुंभ मेला भी इस साल पूर्ण रूप से डिजिटल दुनिया का प्रतीक है। 2025 के महाकुंभ में अलग-अलग तरह के नागा साधुओं का तांता लगा हुआ है और सभी संगम में डुबकी लगाने को आतुर हैं। अगर हम ज्योतिष की मानें तो 144 साल के बाद आने वाले इस अवसर में संगम का पानी अमृत तुल्य हो गया है जिसमें स्नान मात्र से ही मोक्ष के द्वार खुल सकते हैं। इतिहास के पन्नों को पलटने और 1881 से अभी तक के महाकुंभ में होने वाले बदलावों की सही जानकारी के लिए हमने AI की मदद ली। अब चूंकि ये डिजिटल एरा है तो AI ने 1881 से 2025 तक के 144 साल के सफर की मिली-जुली तस्वीरें दिखाईं। आइए आपको भी दिखाते हैं कुछ ऐसी ही तस्वीरें और इतने सालों के बदलावों की जानकारी देते हैं।

1881-महाकुंभ, इलाहाबाद

maha kumbh 1881 to 1993

1881 का महाकुंभ मेला भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। उस समय महाकुंभ का आयोजन भले ही ज्यादा व्यवस्थित नहीं था और श्रद्धालु उस स्थान तक पैदल या बैल गाड़ियों से पहुंचे थे, फिर भी यह मुख्य रूप से धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से अधिक महत्वपूर्ण था। यह मेला केवल स्थानीय श्रद्धालुओं के लिए था और प्रशासनिक व्यवस्थाएं बहुत सीमित थीं। हालांकि स्नान घाटों की व्यवस्था और सुरक्षा के मामले में बहुत सुधार नहीं था, लेकिन यह मेला धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण था उस समय के महाकुंभ में साधु-संन्यासी और अन्य भक्तों की उपस्थिति अधिक संख्या में थी। इस महाकुंभ में लगभग 40 लाख श्रद्धालुओं ने संगम में डुबकी लगाई थी। इस दौरान कैमरे की भी बहुत अच्छी व्यवस्था नहीं होती थी और डिजिटल कैमरा चलन में नहीं था। इसी वजह से 1881 के महाकुंभ की तस्वीर ढूंढ़ना थोड़ा मुश्किल ही है। इसी वजह से हमने AI से इस दौर की तस्वीर निकाली, जिसमें श्रद्धालु संगम में डुबकी लगते नजर आ रहे हैं।

1893-महाकुंभ, इलाहाबाद

1893 में महाकुंभ का आयोजन एक कदम और आगे बढ़ा। इस दौरान यह मेला पहले की तुलना में ज्यादा बड़े पैमाने पर आयोजित किया गया। अब कुछ बड़े पैमाने पर आयोजित किया जा रहा था और प्रशासन ने मेला स्थल पर कुछ आवश्यक सुविधाएं प्रदान करनी शुरू की थीं। इस साल के कुंभ मेले में स्नान घाटों का विस्तार हुआ और साधु-संतों की संख्या में भी वृद्धि हुई। यह मेला अब धीरे-धीरे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ध्यान भी आकर्षित करने लगा था। इस मेले में भारतीय श्रद्धालुओं के साथ विदेशी भी शामिल हुए।

1906 - महाकुंभ, इलाहाबाद

mahakumbh 1906

1905 का महाकुंभ मेला अपने विकास की ओर अग्रसर था और इसमें श्रद्धालुओं के उचित स्थान से लेकर उनके लिए चिकित्सा की व्यवस्था भी की गई। हालांकि इस दौरान एक अजीब घटना भी घटी कि इस दौरान सुरक्षा व्यवस्था में एक व्यक्ति मुस्लिम पुलिस अधिकारी मौजूद था जिसकी वजह से प्रयागराज वालों के एक समूह ने धर्मार्थ भोज में खाना बंद कर दिया। इन्हीं कारणों से सरकार ने महाकुंभ क्षेत्र में मुस्लिम पुलिस अधिकारियों पर प्रतिबंध लगा दिया। उसी समय नागा साधुओं के बीच झड़प हुई और पुलिस ने संघर्ष को खत्म करने के लिए घुड़सवार सेना को हमला करने का आदेश दिया।

1918-महाकुंभ, इलाहाबाद

1918 का महाकुंभ मेला अन्य सालों की तुलना में महत्वपूर्ण था। इस दौरान सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए रेलवे टिकट को सीमित रखा गया था, जिससे महाकुंभ स्थल पर ज्यादा भीड़ न इकठ्ठा हो सके। इस महाकुंभ में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी शामिल हुए थे। महाकुंभ मेला अब पहले के मुकाबले और भी बड़ा हो गया था। इस बार प्रशासन ने मेला स्थल पर बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और व्यवस्था बनाई थी। स्नान घाटों पर सफाई और सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया गया था। इसके अलावा, मेला स्थल पर चिकित्सा सुविधाएं भी प्रदान की गई थीं। उस समय के महाकुंभ को अब एक बड़े धार्मिक उत्सव के रूप में देखा जाने लगा था।

1930-महाकुंभ, इलाहाबाद

maha kumbh 1930 to 1942

साल 1918 के 12 साल बाद  इलाहाबाद में कुंभ मेले का फिर से आयोजन किया गया। यह मेला 14 जनवरी से शुरू होकर 12 फरवरी, 1930 तक चला। इस दौरान अंग्रेजों ने डरते हुए कुंभ मेले का आयोजन किया क्योंकि इसी दौरान महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन की नींव भी रख दी थी। हालांकि कुंभ का आयोजन अच्छी तरह से हुआ और कई श्रद्धालु वहां पहुंचे।

1942-महाकुंभ, इलाहाबाद

साल 1942 में महाकुंभ मेला एक और महत्वपूर्ण मोड़ पर था। यह मेला द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान आयोजित हुआ था और भारतीय समाज पर इसका प्रभाव पड़ा था। यह मेला इस साल की 14 जनवरी से आरंभ होकर 12 फरवरी तक चला। अंग्रेजों ने साल 1942 के कुंभ में इलाहाबाद आने वाले यात्रियों की रेल व बस टिकट विक्रय पर प्रतिबंध लगा दिया था क्योंकि, उन्हें इस बात का डर था कि कुंभ स्थल में क्रांति न हो जाए। चूंकि इस दौरान भारत छोड़ो आंदोलन भी शुरू होने की कगार पर था, इसलिए अंग्रेजों के मन में एक भय था। फिर भी बड़ी संख्या में तीर्थयात्री यहां पहुंचे थे। 

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1954- महाकुंभ, इलाहाबाद

साल 1954 का कुंभ मेला आजाद भारत का पहला महाकुंभ था। इस मेले का जितना धार्मिक महत्व था उतना ही ऐतिहासिक रूप से भी यह महत्वपूर्ण था। यह  महाकुंभ 14 जनवरी से लेकर 3 मार्च तक चला, लेकिन इसे आज भी इसे धार्मिक महत्व की वजह से नहीं बल्कि इसमें घटित होने वाली एक बड़ी दुर्घटना के लिए याद किया जाता है। चूंकि यह स्वतंत्रता के बाद का पहला महाकुंभ था, इसलिए इसका महत्व बहुत अधिक था। इस दौरान किसी भी तरह की रोक-टोक नहीं लगाई गई और देशभर से लाखों श्रद्धालु गंगा, यमुना और सरस्वती के त्रिवेणी संगम में डुबकी लगाने पहुंचे। लोगों के मन में उत्साह था और सभी अमृत स्नान की आस में थे। इस उत्सव में न केवल श्रद्धालु बल्कि साधुओं और नागा साधुओं की बड़ी संख्या भी शामिल हुई। उसी दौरान जब 3 फरवरी 1954 को मौनी अमावस्या के दिन, संगम में शाही स्नान करने के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी तब सुरक्षा व्यवस्था भी डगमगा गई और लाखों की संख्या में भीड़ की वजह से भगदड़ मच गई। महाकुंभ के दौरान हुई ये बड़ी घटना आज भी इतिहास में शामिल बड़े हादसों में से एक है, जिसमें मृतकों की संख्या 1500 से अधिक थी और हजारों श्रद्धालु घायल हुए थे।

1966-महाकुंभ, इलाहाबाद

1966 का महाकुंभ मेला अब पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हो चुका था। प्रशासन ने इस बार मेला स्थल पर अत्याधुनिक सुविधाएं मुहैया कराई थीं और मेला स्थल पर यातायात व्यवस्था, चिकित्सा सुविधाएं और सुरक्षा व्यवस्था को और बेहतर किया गया था। यह मेला इंदिरा गांधी के कार्यकाल में आयोजित हुआ था और इस दौरान कुछ राजनीतिक बदलाव भी सामने आए, लेकिन 1966  का महाकुंभ इसलिए भी खास था क्योंकि इसी कुंभ मेले में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लाल बहादुर शास्त्री जी की अस्थियों का विसर्जन संगम में 25 जनवरी 1966 को किया था। उसके बार उन्होंने जनता को संबोधित करते हुए एक भावुक भाषण भी दिया था।

1977-महाकुंभ, इलाहाबाद

1977 में इलाहाबाद में आयोजित महाकुंभ कई कारणों से विशेष था। यह आयोजन आपातकाल के दौरान हुआ था, जब देश में इंदिरा गांधी की सरकार थी। उस समय की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों ने इस महाकुंभ को और ज्यादा ऐतिहासिक बना दिया। आपातकाल के दौरान भी श्रद्धालुओं की आस्था और उत्साह में कोई कमी नहीं आई। लाखों भक्त पवित्र संगम में स्नान के लिए इकट्ठा हुए, जिससे यह आयोजन एक अद्वितीय धार्मिक और सांस्कृतिक अनुभव बन गया। महाकुंभ ने न केवल लोगों की आध्यात्मिकता को दर्शाया, बल्कि यह भी साबित किया कि भारतीय परंपराएं और मान्यताएं समय और परिस्थितियों से परे हैं।

1989- महाकुंभ, इलाहाबाद

maha kumbh changes

1989 में प्रयागराज में आयोजित महाकुंभ मेला एक ऐतिहासिक धार्मिक आयोजन के रूप में प्रसिद्ध हुआ। इस मेले में तकनीकी सुधारों के साथ यातायात, चिकित्सा और सुरक्षा व्यवस्था को पहले से अधिक सुदृढ़ बनाया गया था। लाखों साधु-संत और श्रद्धालु इस महाकुंभ में शामिल हुए, जिससे आयोजन भव्य और अद्वितीय बन गया। इसी दौरान राम मंदिर निर्माण को लेकर आंदोलन ने गति पकड़ी, जो एक प्रमुख राष्ट्रीय मुद्दा बनकर उभरा। इस महाकुंभ ने न केवल धार्मिक महत्व को उजागर किया, बल्कि उस समय की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों पर भी गहरी छाप छोड़ी।

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2001- महाकुंभ, इलाहाबाद

साल 2001 का महाकुंभ 21वीं सदी का पहला महाकुंभ था। साल 2001 का यह मेला इलेक्ट्रॉनिक और सैटेलाइट युग आने के बाद का पहला कुंभ मेला था। इस दौरान अध्यात्म और संस्कृति के साथ टेक्नोलॉजी भी शामिल हो गई थी। इस कुंभ में बौद्ध गुरु दलाई लामा भी शामिल हुए थे। इस महाकुंभ में पहली बार उत्तर प्रदेश सरकार ने कुंभ मेले की आधिकारिक वेबसाइट बनवाई और इस भव्य आयोजन को इंटरनेट के जरिए दुनिया के सामने रखा। इस दौरान मेला क्षेत्र में इंटरनेट सुविधा से भरपूर साइबर कैफे बनाए गए। सरकारी आंकड़ों की मानें तो इस महाकुंभ में श्रद्धालुओं की संख्या 7 करोड़ से ज्यादा थी।

2013- महाकुंभ, इलाहाबाद

maha kumbh transformation

साल 2013 के कुंभ मेले में भी भी 1954 की छवि दिखाई दी। पूरी सुरक्षा व्यवस्था होने के बाद भी 10 फरवरी, मौनी अमावस्या के दिन लाखों की संख्या में श्रद्धालु संगम तट पर पहुंचे और शाही स्नान के बाद घर लौटने के लिए इलाहाबाद जंक्शन और बस अड्डों की ओर जाने लगे। रेलवे स्टेशन और प्लेटफार्म में पहले से ही काफी भीड़ थी और प्लेटफार्म की ओर जाने वाले फुट ओवरब्रिज पर अचानक भगदड़ मच गई। इस भगदड़ के दौरान कई लोग सीढ़ियों से गिर गए, जबकि कुछ को भीड़ ने ही कुचल दिया। आंकड़ों की मानें तो इस दर्दनाक हादसे में 35 लोगों की जान गई जबकि कई लोग घायल हुए।

2025- महाकुंभ, प्रयागराज

अक्टूबर 2018 में इलाहाबाद का नाम एक बार फिर से प्रयागराज रख दिया और साल 2025 महाकुंभ मेला, प्रयागराज में आयोजित हो रहा है। 144 सालों में महाकुंभ के उतार-चढ़ावों ने सबको सोचने के लिए कुछ तथ्य प्रदान किए। इस साल लगने वाला यह मेला बहुत ज्यादा सुरक्षा व्यवस्था से युक्त है। AI, डिजिटल तकनीक और स्मार्ट सुरक्षा प्रणालियों के साथ मेला पहले से कहीं अधिक व्यवस्थित नजर आ रहा है। इस बार मेला स्थल और भी बेहतर यातायात व्यवस्था, चिकित्सा सुविधाएं और सुरक्षा व्यवस्था लिए हुए है। यही नहीं इस दौरान सुरक्षा व्यवस्था इतनी ज्यादा है कि मेला स्थल के 5 किलोमीटर पहले से ही वाहनों की एंट्री पर रोक लगी हुई है। इस महाकुंभ का आरंभ 13 जनवरी से हुआ था और यह 26 फरवरी, 2025 महाशिवरात्रि के दिन तक चलेगा। इस दौरान शाही स्नान की कई तिथियां हैं जिसमें स्नान से मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। इस महाकुंभ मेले का मुख्य आकर्षण नागा साधु बने हुए हैं। डिजिटल एरा के इस जमाने में न जाने कितने साधुओं को अपने विलक्षण गुणों की वजह से फेम मिल रहा है। अगर इस महाकुंभ   को अध्यात्म के साथ मनोरंजन का स्थान भी कहा जाए तो शायद गलत नहीं होगा। जहां लाखों नहीं बल्कि करोड़ों की संख्या में श्रद्धालु सम्मिलित हो रहे हैं। इस दौरान कुछ नागा साधुओं की वेशभूषा भी तेजी से वायरल हो रही है और वो आम जनता के बीच आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं।

साल 1881 के महाकुंभ का इतिहास हो या फिर 2025 के डिजिटल जमाने का कुंभ मेला। ये अपने आप में न जाने कितनी विशेषताएं समेटे हुए भारत की संस्कृति को उजागर करता हुआ अवसर है।
इस आर्टिकल की तस्वीरें हमें AI ने दिखाई हैं और महाकुंभ के अलग-अलग रूपों को एक माला में पिरोने का प्रयास किया है। आपका इससे जुड़ा कोई भी सवाल है तो आप कमेंट बॉक्स में हमें जरूर बताएं। आपको यह स्टोरी अच्छी लगी हो तो इसे फेसबुक पर शेयर और लाइक जरूर करें। इसी तरह और भी आर्टिकल पढ़ने के लिए जुड़े रहें हरजिंदगी से।

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