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Viral News: '23 साल के बाद हमारे घर में छोटा बाबू आया है...' लड़के की चाहत में 9 बेटियों के बाद पैदा किया एक बेटा, नाम रखा दिलखुश; कब बदलेगी समाज की सोच?

हरियाणा के जींद से सामने आई 9 बेटियों के बाद बेटे के जन्म की खबर समाज में गहरे बैठे लिंग भेद को उजागर करती है। बेटे की चाहत में 10वीं संतान पैदा करना क्या वाकई गर्व की बात है? इस लेख में जानिए कैसे आज भी बेटियों को कमतर समझा जाता है, मानसिक दबाव कैसे बनता है और कब बदलेगी समाज की सोच। पढ़ें पूरा ओपिनियन।
Editorial
Updated:- 2026-01-22, 07:54 IST

हम कितना भी तरक्‍की कर लें, मगर लोगों की सोच में विकास होने की गुंजाइश हमेशा ही बनी रहेगी। खासतौर पर बात जब लड़का और लड़की कि की जाए, तो आज भी समाज में ऐसे लोग मौजूद हैं, जो बेटों को ज्‍यादा महत्‍व देते हैं। सोशल मीडिया पर कुछ दिन पहले एक खबर बहुत वायरल हो रही थी, जिसमें बताया गया था कि कैसे एक दाम्‍पति ने 9 बेटियों के बाद 10वीं संतान के रूप में बेटे को जन्‍म दिया। बेशक यह उस परिवार के लिए खुशी की बात हो, मगर यह घटना यही दर्शाती हैं कि एक माता-पिता के लिए 9 बेटियां काफी नहीं हैं, 10वीं बार भी उन्‍होंने ट्राई किया ताकि एक बेटे उनके परिवार में आ जाए।

यह घटना हरयाणा की जींद की है। यहां एक परिवार में पहले से ही 12 बेटियां थी। बेटे की चाहत में घर के छोटे बेटे ने, जिसकी पहले से ही 9 बेटियां थीं, हिम्‍मत दिखाई और 10वीं संतान को जन्‍म देने की तैयारी की। घर में एक बेटा आ जाए, पति के इस संकल्‍प को पूरा करने में पत्‍नी में भी पूरा साथ दिया। ईश्‍वर ने भी इस बार सुन ली और बेटा होगा। बेटे का नाम दिलखुश रखा गया। शिशु के माता-पिता कहते हैं, "23 साल के बाद हमारे घर में छोटा बाबू आया है…" यह वाक्य सुनने में भावुक जरूर लगता है, लेकिन इसके पीछे छिपा दर्द, भेदभाव और असमानता हमें सोचने पर मजबूर करती है।

लिंग भेद क्‍यों ?

किसी भी परिवार में बच्चे का जन्म खुशी का कारण होना चाहिए, फिर चाहे वह बेटा हो या बेटी। लेकिन जब 9 बेटियों के बाद 10वीं संतान के रूप में बेटे का जन्म खबर बन जाए, तो यह साफ संकेत देता है कि बेटियों को अब भी 'पर्याप्त' नहीं माना जाता। राज्‍य सरकारों ने बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे अभियान चलाए, कानून बने, जागरूकता फैलाई गई, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी नहीं बदली। आज भी लड़का होने पर खुशी और लड़की होने पर खुशी मनाई जाती है।

मानसिक और सामाजिक दबाव

'काश एक बेटा हो जाता', ' अब वंश कैसे आगे बढ़ेगा', 'बेटियां तो पराई होती हैं'...यह मानसिकता आज भी लोगों के लिए भावनात्मक बोझ बनी हुई है, जो किसी भी बच्ची के आत्मविश्वास, शिक्षा और भविष्य को प्रभावित करता है। बेटियों को अक्सर यह एहसास दिलाया जाता है कि वे किसी अधूरे सपने की निशानी हैं, जबकि बेटा उस सपने की पूर्ति।

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9 daughters one son named dilkhush

बेटियों को बराबरी कब मिलेगी?

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर बेटियों को बराबरी का हक कब मिलेगा। आज के दौर में जब लड़कियां अंतरिक्ष तक पहुंच रही हैं, सेना, विज्ञान, खेल, राजनीति और हर प्रोफेशन में पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं, तो फिर उन्हें लड़कों से कमतर आंकने की सोच कहां से आती है? बेटियां आज सिर्फ घर ही नहीं संभाल रहीं, बल्कि परिवार, समाज और देश की जिम्मेदारियां भी बखूबी निभा रही हैं। ऐसे में बेटे की चाहत में बेटियों को कमतर समझना न सिर्फ गलत है, बल्कि समाज की सोच पर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है।

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तो 9 बेटियों के बाद मात्र 1 बेटे की चाहत के लिए 10वें बच्‍चे को जन्‍म देना न तो कोई वाह-वाही का काम है, न बहादुरी का। महंगाई के इस जमाने में जहां सरकार भी हम दो हमारे दो का परिवार नियोजन कैंपेन चला रही, तब केवल एक बेटे की चाहत के लिए आप देश की आबादी बढ़ा रहे है, इसे नसमझी ही कहा जाएगा। आपकी क्‍या राय है हमें जरूर बताएं। यह लेख पसंद आया हो तो इसे शेयर और लाइक जरूर करें, इसी तरह और भी आर्टिकल्‍स पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।

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FAQ
बेटे की चाहत आज भी भारतीय समाज में क्यों बनी हुई है?
वंश बढ़ाने, बुज़ुर्गों की देखभाल और सामाजिक दबाव जैसी पुरानी सोच इसकी बड़ी वजह है।
बेटे की चाहत में पैदा हुए बच्चे पर भी क्या दबाव होता है?
हां, उस पर ‘वंश चलाने’ और परिवार की उम्मीदों का भारी बोझ डाल दिया जाता है।
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