Thu Feb 12, 2026 | Updated 07:22 AM IST
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Vijaya Ekadashi Vrat Katha 2026: फाल्गुन महीने की विजया एकादशी पर पढ़ें यह व्रत कथा, भगवान विष्णु के आशीर्वाद से खुल सकती है किस्मत

फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली विजया एकादशी को विजय, सफलता और बाधा मुक्ति देने वाली तिथि माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा और व्रत कथा का पाठ करने से रुके हुए कार्य भी पूरे होने लगते हैं। आइए जानते हैं विजया एकादशी की पौराणिक व्रत कथा के बारे में।
Editorial
Updated:- 2026-02-12, 05:01 IST

हिंदू धर्म में किसी भी एकादशी का विशेष महत्व होता है और इसमें भगवान विष्णु का पूजन करना फलदायी माना जाता है। इसी तरह से फाल्गुन महीने की विजया एकादशी का व्रत सनातन धर्म में विशेष महत्व रखता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक भगवान विष्णु की पूजा करने तथा व्रत कथा का पाठ करने से जीवन की सभी बाधाएं दूर हो सकती हैं और सफलता के मार्ग खुलते हैं। जैसे कि विजया नाम ही अपने आप में जीत, सिद्धि और शुभ परिणाम का संकेत देता है, इसलिए इस एकादशी को हर प्रकार के कार्य में विजय दिलाने वाली तिथि माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार विजया एकादशी का व्रत रखने से पापों का क्षय होता है और भक्त को भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। जो लोग लंबे समय से किसी परेशानी, रुकावट या असफलता का सामना कर रहे हैं, उनके लिए यह व्रत बेहद फलदायी माना जाता है। इस दिन विधि-विधान से पूजा करने के साथ व्रत कथा का पाठ करना या कथा सुनना अत्यंत शुभ माना जाता है। आइए जानें विजया एकादशी की व्रत कथा के बारे में विस्तार से।  

विजया एकादशी व्रत कथा

युधिष्ठिर ने एक बार श्री कृष्ण से पूछा कि हे वासुदेवा ! फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एकादशी का क्या महत्व होता है। ऐसे में श्री कृष्ण ने इस एकादशी की कथा बताते हुए कहा कि इस एकादशी को विजया एकादशी के नाम से जाना जाता है। भगवान् श्रीकृष्ण बोले- युधिष्ठिर ! एक बार नारद जी ने कमल के आसन पर विराजमान होने वाले ब्रह्माजी से से यह प्रश्न किया- 'सुरश्रेष्ठ ! फाल्गुन महीने के कृष्णपक्ष की एकादशी जिसे 'विजया' एकादशी कहा जाता है उसका वर्णन बताएं। इस बात पर ब्रह्माजी ने कहा -नारद मुनि ! सुनिए 'मैं एक उत्तम कथा सुनाता हूं, जो पापों का हरण करने वाली है। यह व्रत बहुत ही प्राचीन, पवित्र और पाप नाशक माना जाता है। 'विजया' नाम की एकादशी राजाओं को विजय प्रदान करने वाली होती है, इसमें कदाचित संदेह नहीं है। पूर्वकाल की बात है, प्रभु श्री राम ने चौदह वर्षों के लिए वन में गए और वहां वन में पञ्चवटी में सीता तथा लक्ष्मण के साथ रहने लगे।

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vijaya ekadashi ki vrat katha

वहां रहते समय रावण ने प्रभु श्री राम की अर्धांगिनी माता सीता का हरण कर लिया। उससे श्री राम अत्यंत व्याकुल हो उठे। उस समय सीता की खोज करते हुए वे वन में घूमने लगे। आगे बढ़ने पर श्री राम और लक्ष्मण को जटायु मिले, जिनका प्राणांत हो चुका था। आगे वन में उन्होंने कबंध नामक राक्षस का वध किया। इसके बाद उनकी मित्रता सुग्रीव से हुई और श्रीराम के कार्य के लिए वानरों की विशाल सेना संगठित की गई। हनुमान जी लंका के उद्यान में पहुंचकर माता सीता से मिले और उन्हें श्रीराम की मुद्रिका देकर उनका विश्वास दृढ़ किया यह उनका अत्यंत पराक्रमी और समर्पित कार्य था। वहां से लौटकर हनुमान जी ने लंका का पूरा हाल प्रभु श्रीरामचंद्रजी को विस्तार से बताया।
यह सब सुनकर श्रीराम ने सुग्रीव से विचार-विमर्श किया और लंका की ओर प्रस्थान करने का निश्चय किया। समुद्र तट पर पहुंचकर उन्होंने लक्ष्मण से कहा “हे सुमित्रानंदन, बताओ ऐसा कौन-सा पुण्य या उपाय है जिससे इस अथाह समुद्र को पार किया जा सके? यह गहरा है और भयंकर जलचरों से भरा हुआ है। इसे सरलता से पार करने का कोई मार्ग मुझे दिखाई नहीं दे रहा।'

vijaya ekadashi vrat ki katha kya hai

लक्ष्मण जी बोले- महाराज ! आप ही आदिदेव और पुरुषोत्तम हैं। आपसे क्या छिपा है? यहां द्वीप के भीतर बकदाल्भ्य नामक मुनि रहते हैं। यहां से आधे योजन की दूरी पर उनका आश्रम है। रघुनन्दन ! उन प्राचीन मुनीश्वर के पास जाकर उनसे इसका उपाय पूछिये।

लक्ष्मण की यह बात सुनकर श्री रामचंद्र जी बकदाल्भ्य मुनि के आश्रम पहुंचे। वहां जाकर उन्होंने झुककर मुनि को प्रणाम किया। मुनि ने तुरंत पहचान लिया कि ये स्वयं भगवान श्रीराम हैं, जो विशेष उद्देश्य से मनुष्य रूप में अवतरित हुए हैं। उनके आगमन से मुनि अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने पूछा, “प्रभु, आपके यहां आने का क्या कारण है?”

श्रीराम ने कहा, 'हे मुनिवर, आपकी कृपा से मैं वानर सेना सहित समुद्र तट तक पहुंचा हूं और राक्षसों सहित लंका पर विजय प्राप्त करना चाहता हूं। कृपया बताइए कि इस समुद्र को पार करने का सरल उपाय क्या है।” तब बकदाल्भ्य मुनि बोले, 'हे श्रीराम, फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली ‘विजया एकादशी’ का व्रत करें। इस व्रत के प्रभाव से आपको निश्चित ही विजय प्राप्त होगी और आप अपनी सेना सहित समुद्र पार कर लेंगे।'

मुनि ने व्रत की विधि बताते हुए कहा, 'दशमी तिथि के दिन सोने, चांदी, तांबे या मिट्टी का एक कलश स्थापित करें। उसमें जल भरकर पत्तों के पल्लव डालें और ऊपर भगवान नारायण की प्रतिमा स्थापित करें। एकादशी के दिन प्रातः स्नान करके कलश का पूजन करें। माला, चंदन, सुपारी, नारियल आदि से विधिपूर्वक पूजा करें। कलश पर सप्तधान्य और जौ रखें। धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। दिनभर भगवान की कथा सुनें और रात में जागरण करें। घी का अखंड दीपक जलाएं।'

'द्वादशी के दिन सूर्योदय के बाद उस कलश को नदी, सरोवर या जलाशय के पास ले जाकर पुनः पूजा करें और प्रतिमा सहित कलश को विद्वान ब्राह्मण को दान कर दें। साथ ही अपनी क्षमता अनुसार अन्य दान भी करें। इस प्रकार श्रद्धा से विजया एकादशी का व्रत करने से विजय निश्चित होती है।'

ब्रह्मा जी ने नारद से कहा कि श्रीराम ने मुनि के बताए अनुसार विजया एकादशी का व्रत किया और उसी के प्रभाव से वे युद्ध में विजयी हुए। उन्होंने रावण का वध किया, लंका पर विजय पाई और माता सीता को वापस प्राप्त किया। जो भी मनुष्य इस विधि से व्रत करता है, उसे इस लोक में सफलता और परलोक में अक्षय फल मिलता है।

यदि आप भी इस व्रत का पालन करती हैं और विष्णु जी के पूजन के साथ विजया एकादशी व्रत की कथा का पाठ करती हैं तो सदैव विष्णु जी की कृपा बनी रहती है।

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