
हिंदू धर्म में किसी भी पूर्णिमा तिथि का विशेष महत्व है और पूरे साल में 12 पूर्णिमा तिथियां मनाई जाती हैं। इनमें से फाल्गुन पूर्णिमा का विशेष महत्व है। इस दिन माता लक्ष्मी का पूजन करने के साथ चंद्रमा की पूजा भी की जाती है। यदि आप भी इस दिन व्रत करती हैं और नियम से फाल्गुन पूर्णिमा की पूजा करने के साथ व्रत कथा का पाठ भी करती हैं तो आपके जीवन में आने वाली बाधाएं दूर हो सकती हैं। फाल्गुन पूर्णिमा के दिन ही होलिका दहन भी किया जाता है, इसलिए इस पूर्णिमा का महत्व और ज्यादा बढ़ जाता है। इस साल फाल्गुन पूर्णिमा 03 मार्च को मनाई जाएगी और इसका आरंभ 02 मार्च की शाम से ही हो जाएगा। आइए ज्योतिर्विद पंडित रमेश भोजराज द्विवेदी से जानें फाल्गुन पूर्णिमा की सही पूजा विधि और इसकी व्रत कथा के बारे में विस्तार से।


एक बार की बात है होली का पर्व निकट था और भगवान जगन्नाथ जी के मन में भी भक्तों के संग रंग खेलने की इच्छा जाग उठी। फाल्गुन पूर्णिमा की मधुर बेला थी, नीलाचल की हवा में अबीर-गुलाल की सुगंध घुली हुई थी। मंदिर के गर्भगृह में प्रभु के अधरों पर अनोखी मुस्कान थी। उन्होंने बड़े भाई बलभद्र जी और बहन सुभद्रा जी से आग्रह किया कि 'ब्रज में तो मैंने बहुत होली खेली, पर नीलाचल के भक्तों संग कभी खुलकर रंग नहीं खेल पाया। इस बार भेष बदलकर उनके बीच चलें?'
बलभद्र जी हंस पड़े, 'कन्हैया, तुम्हारी आंखें ही तुम्हारी पहचान बता देंगी!' सुभद्रा जी ने भी कान्हा से सावधानी बरतने को कहा। उन तीनों ने योजना बनाई कि होली इस साल भक्तों के साथ मनाएंगे। ऐसे में जगन्नाथ जी साधारण कीर्तनिया बने और पीली पगड़ी, हल्का चंदन, और आंखों में काजल लगाकर चल दिए। बलभद्र जी हंसमुख ढोलकिया बने और सुभद्रा जी साधारण युवती का रूप धर पुष्पों की टोकरी ले ली। प्रभु ने अपनी योगमाया से दिव्य आभा मंद कर ली और प्रण किया कि होली पूरी होने तक कोई चमत्कार प्रकट नहीं करेंगे।
मंदिर के बाहर कीर्तन चल रहा था 'आओ रे आओ रंग बरसाने…' तीनों अजनबी बन मंडली में शामिल हो गए। जगन्नाथ जी के मधुर स्वर से सब झूम उठे, बलभद्र जी की ढोलक पर बच्चे-बूढ़े नाचने लगे और सुभद्रा जी फूलों व गुलाल से सबको रंगने लगीं। एक पंडित ने जगन्नाथ जी की अद्भुत आंखें देखकर शंका दिखाई, उस समय प्रभु ने हंसकर बात टाल दी।
उसी समय एक गरीब कन्या उदास खड़ी थी, क्योंकि उसके पास रंग नहीं था। सुभद्रा जी का हृदय पिघल गया, पर चमत्कार दिखाना वर्जित था। तब जगन्नाथ जी ने ढोल की ताल बदलवाई। ताल की कंपन से ऊपर रखी गुलाल की पोटली हिली और हवा संग उसका रंग उस कन्या पर बरस पड़ा। बालिका हर्ष से बोली, 'लगता है स्वयं जगन्नाथ जी ने मुझे रंग दिया!' तीनों ने एक-दूसरे की ओर देखकर मुस्कुरा दिया।
संध्या होते ही वे अपने स्थान पर लौट आए। गर्भगृह में प्रवेश करते ही उनका दिव्य स्वरूप प्रकट हो गया। अगले दिन जब पट खुले, तो भक्तों ने देखा कि प्रभु के चरणों में वही रंग सजा हुआ है। एक वृद्ध भक्त की आंखों से आंसू बह निकले और वो सोचने लगा कि क्या कल स्वयं प्रभु हमारे बीच थे?
जगन्नाथ जी बोले, 'प्रेम छिपता कहां हैं ? आनंद तो तब है जब भक्त हमें खोजते हैं और हम उन्हीं के बीच होते हैं। मंदिर में 'जय जगन्नाथ' के जयकारे गूंज उठे।
उसी समय से फाल्गुन पूर्णिमा के दिन इसी व्रत कथा का पाठ किया जाता है।
यदि आप भी यहां बताई पूजा विधि के साथ फाल्गुन पूर्णिमा की पूजा करें और व्रत कथा का पाते करेंगी तो आपके जीवन में खुशहाली बनी रहेगी। आपको यह स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।
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