
माघ मेला संगम की रेती पर लगने वाला आस्था का वह पावन समागम है, जहां देश-दुनिया से श्रद्धालु पुण्य की डुबकी लगाने आते हैं। हिंदू धर्म में माघ महीने को अत्यंत पवित्र माना गया है और प्रयागराज में संगम तट पर कल्पवास व दान-पुण्य करना मोक्ष का द्वार माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, इस माह में देवलोक के समस्त देवता पृथ्वी पर आते हैं और तीर्थराज प्रयाग में अदृश्य रूप से वास करते हैं। ऐसी मान्यता है कि माघ मेले के दौरान किया गया एक छोटा सा दान भी कई जन्मों के पुण्यों के बराबर फल देता है। ऐसे में वृंदावन के ज्योतिषाचार्य राधाकांत वत्स से आइये जानते हैं कि माघ मेले में दान करने का क्या महत्व, क्या नियम हैं और कौंन से पापों से छुटकारा मिल जाता है?
माघ मेले में ऋतु के अनुसार और आध्यात्मिक लाभ के लिए कुछ विशिष्ट वस्तुओं का दान सबसे उत्तम माना गया है। माघ मास में तिल का दान सबसे प्रमुख है। तिल का दान करने से व्यक्ति के कष्ट दूर होते हैं और सूर्य देव की कृपा बनी रहती है। कड़ाके की ठंड के कारण जरूरतमंदों को कंबल, ऊनी कपड़े और जूते-चप्पल का दान करना महादान कहलाता है।
भूखे को भोजन कराना या कच्चा अनाज जैसे चावल, दाल, आटा आदि का दान करना साक्षात ईश्वर की सेवा मानी जाती है। शरीर को ऊर्जा देने वाली वस्तुओं का दान करना स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए शुभ होता है। अपनी सामर्थ्य के अनुसार स्वर्ण या गाय का दान करने से पितरों को तृप्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

माघ मेले में दान का महत्व केवल भौतिक वस्तुओं के त्याग तक सीमित नहीं है बल्कि इसे 'जन्म-जन्मांतर के दुखों से मुक्ति' का मार्ग माना गया है। माघ के महीने में सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं जिसे ऊर्जा और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है।
इस समय दान करने से व्यक्ति के भीतर का अहंकार कम होता है और करुणा का भाव जागृत होता है। पद्म पुराण में कहा गया है कि माघ मास में दान करने वाला व्यक्ति मृत्यु के पश्चात स्वर्गलोक को प्राप्त करता है और उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। यह दान दरिद्रता का नाश करता है और जीवन में सुख-समृद्धि लाता है।
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दान करने से पहले संगम या किसी पवित्र नदी में स्नान करें। यदि यह संभव न हो, तो घर पर ही जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करें। दान करने से पहले हाथ में जल और अक्षत लेकर संकल्प करें कि आप यह दान किस उद्देश्य से या किस देवता की प्रसन्नता के लिए कर रहे हैं।
दान हमेशा किसी सुपात्र ब्राह्मण या अत्यंत जरूरतमंद व्यक्ति को ही देना चाहिए। दान देते समय मन में कोई अहंकार नहीं होना चाहिए। 'मैंने दिया है' का भाव पुण्य को नष्ट कर देता है। दान करते समय कम से कम बोलना चाहिए, इसे 'गुप्त दान' की श्रेणी में रखना और भी फलदायी होता है।

ऐसी मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक दान करने से व्यक्ति के जघन्य पापों जैसे ब्रह्महत्या, बाल हत्या आदि का प्रभाव भी कम हो जाता है। व्यापार या व्यवहार में बोले गए झूठ और किए गए छल से जो दोष लगता है, माघ मास का दान उसे मिटाने में सहायक होता है।
इस माह में दान करने से पितृ दोष से मुक्ति मिलती है और पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है। मन में आए बुरे विचार और शरीर द्वारा की गई गलतियों का प्रायश्चित दान के माध्यम से संभव है। यह व्यक्ति के हृदय को शुद्ध कर देता है जिससे उसे नई ऊर्जा और सकारात्मकता प्राप्त होती है।
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