difference between parikrama and pradakshina

प्रदक्षिणा और परिक्रमा में क्या अंतर है? जानें दोनों का महत्व और लाभ

परिक्रमा या प्रदक्षिणा करना व्यक्ति को ब्रह्मांड के केंद्र यानी भगवान के साथ जोड़ने का एक सशक्त माध्यम है। माना जाता है कि मंदिर के गर्भगृह या देव प्रतिमा के चारों ओर घूमने से वहां व्याप्त सकारात्मक ऊर्जा हमारे शरीर में प्रवेश करती है और हमारे संचित पापों का क्षय होता है।
Editorial
Updated:- 2026-01-19, 14:38 IST

हिंदू धर्म और संस्कृति में 'प्रदक्षिणा' और 'परिक्रमा' दोनों ही शब्द भगवान के प्रति श्रद्धा और समर्पण व्यक्त करने के लिए उपयोग किए जाते हैं। हालांकि सामान्य बोलचाल में इन्हें एक ही माना जाता है, लेकिन इनके पीछे के भाव और नियमों में सूक्ष्म अंतर है। आध्यात्मिक दृष्टि से, यह क्रिया व्यक्ति को ब्रह्मांड के केंद्र यानी भगवान के साथ जोड़ने का एक सशक्त माध्यम है। माना जाता है कि मंदिर के गर्भगृह या देव प्रतिमा के चारों ओर घूमने से वहां व्याप्त सकारात्मक ऊर्जा हमारे शरीर में प्रवेश करती है और हमारे संचित पापों का क्षय होता है। ऐसे में वृंदावन के ज्योतिषाचार्य राधाकांत वत्स से आइये जानते हैं कि परिक्रमा और प्रदक्षिणा में क्या अंतर होता है? 

क्या होती है परिक्रमा?

'परिक्रमा' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है 'परि' जिसका अर्थ है 'चारों ओर' और 'क्रम' जिसका अर्थ है 'चलना'। साधारण शब्दों में कहें तो किसी व्यक्ति, वस्तु, पर्वत, नदी या मंदिर के चारों ओर पूरी तरह से घूमने को परिक्रमा कहते हैं। परिक्रमा का दायरा बड़ा होता है।

what is parikrama

परिक्रमा के दौरान भक्त अपने आराध्य के प्रति पूर्ण समर्पण भाव रखता है। उदाहरण के लिए, भक्त गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करते हैं, नर्मदा नदी की परिक्रमा करते हैं या पूरे ब्रज मंडल की चौरासी कोस की परिक्रमा करते हैं।

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इसका मुख्य उद्देश्य उस पवित्र क्षेत्र की सकारात्मक ऊर्जा को अपने शरीर और मन में आत्मसात करना होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, परिक्रमा करने से व्यक्ति के कुंडली के अशुभ ग्रहों का प्रभाव कम होता है और संचित पापों का नाश होता है।

क्या होती है प्रदक्षिणा?

'प्रदक्षिणा' शब्द का गहरा शास्त्रीय अर्थ है। इसमें 'प्र' का अर्थ है 'आगे बढ़ना' और 'दक्षिणा' का अर्थ है 'दक्षिण' या 'दायां भाग'। प्रदक्षिणा का अर्थ है इस प्रकार घूमना कि पूज्य विग्रह या मंदिर हमेशा आपके दाएं हाथ की ओर रहे।

what is pradakshina

प्रदक्षिणा आमतौर पर मंदिर के गर्भगृह के चारों ओर या भगवान की मूर्ति के निकट की जाती है। यह एक अनुशासित आध्यात्मिक क्रिया है। शास्त्रों के अनुसार, हमारे शरीर का दायां हिस्सा सकारात्मकता का प्रतीक है। 

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यही कारण है कि भगवान को सदैव दाईं ओर रखकर चलने से हम उनकी ईश्वरीय शक्ति को ग्रहण कर पाते हैं। प्रदक्षिणा करते समय 'नमो' मंत्र का जाप करना या शांत रहना अनिवार्य माना गया है। यह क्रिया व्यक्ति के अहंकार को कम करती है और उसे भगवान से जोड़ती है।

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image credit: herzindagi 

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