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Sabarimala Temple: क्या है महिलाओं के प्रवेश से जुड़ा पूरा मामला, जानें किन सात सवालों पर विचार कर रही है संविधान पीठ?

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मुद्दा भारत के कानूनी और धार्मिक इतिहास का एक जटिल मामला है। यह लेख महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध के पीछे की मान्यताओं (भगवान अयप्पा का ब्रह्मचर्य, मालिकापुरथम्मा की कहानी) और जस्टिस नागरत्ना की 'अछूत' संबंधी टिप्पणी पर प्रकाश डालता है। 
Editorial
Updated:- 2026-04-09, 13:52 IST

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मुद्दा भारत के कानूनी और धार्मिक इतिहास के सबसे जटिल मामलों में से एक रहा है। यह विवाद केवल एक मंदिर में प्रवेश तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संवैधानिक अधिकारों और सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताओं के बीच के संघर्ष को भी दर्शाता है। ऐसे में लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि महिलाओं के प्रवेश में क्यों प्रतिबंध लगा है और किन सवालों पर विचार कर रही है संविधान पीठ? आज का हमारा लेख इसी विषय पर है। आज हम आपको अपने इस लेख के माध्यम से बताएंगे कि महिलाओं से प्रवेश से जुड़ा मुद्दा क्या है। पढ़ते हैं आगे...

क्यों था महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध?

हिंदू मान्यताओं के अनुसार, भगवान अयप्पा को भगवान शिव और विष्णु के स्त्री अवतार 'मोहिनी' की संतान माना जाता है। सबरीमाला मंदिर उन्हीं को समर्पित है। यहां 10 से 50 साल की उम्र वाली महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी के पीछे मुख्य रूप से दो कथाएं प्रचलित हैं-

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ब्रह्मचर्य की मान्यता: माना जाता है कि भगवान अयप्पा एक 'नैष्ठिक ब्रह्मचारी' हैं, जिन्होंने सांसारिक इच्छाओं और महिलाओं के संपर्क से दूर रहने का संकल्प लिया था। भक्तों का मानना है कि रजस्वला आयु की महिलाओं के प्रवेश से देवता की ब्रह्मचर्य साधना में बाधा पड़ सकती है।

मालिकापुरथम्मा की कहानी: एक अन्य कथा के अनुसार, भगवान अयप्पा ने एक राक्षसी को पराजित किया था जो बाद में एक सुंदर स्त्री बन गई और उनसे विवाह का प्रस्ताव रखा। भगवान ने वचन दिया कि जिस दिन सबरीमाला में भक्तों (कन्निस्वामी) का आना बंद हो जाएगा, वह उससे विवाह करेंगे। भक्तों का मानना है कि उन देवी के सम्मान में महिलाएं मंदिर में प्रवेश नहीं करतीं।

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अछूत होने की धारणा पर अदालत की टिप्पणी

इस मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने 'छुआछूत' (अनुच्छेद 17) के संदर्भ में टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी महिला को महीने के तीन दिन अछूत मानना और चौथे दिन उसे शुद्ध मान लेना तर्कसंगत नहीं है। उन्होंने जोर दिया कि न्यायपालिका को जमीनी हकीकत और महिला की गरिमा को ध्यान में रखते हुए इस संवेदनशील मुद्दे को देखना चाहिए।

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संविधान पीठ के सामने खड़े 7 अहम सवाल

  • संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार का दायरा और सीमा क्या है?
  • संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत व्यक्तियों के अधिकारों और संविधान के अनुच्छेद 26 के तहत धार्मिक संप्रदायों के अधिकारों बीच क्या आपसी संबंध है?
  • क्या संविधान के अनुच्छेद 26 के तहत किसी धार्मिक संप्रदाय के अधिकार, सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, और स्वास्थ्य के अलावा संविधान के भाग तीन के अन्य प्रविधानों के अधीन हैं?
  • संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत नैतिकता शब्द का दायरा और विस्तार क्या है, और क्या इसका मतलब इसमें संवैधानिक नैतिकता को शामिल करना है?
  • अनुच्छेद 25 में बताई गई किसी धार्मिक प्रथा के संबंध में न्यायिक समीक्षा का दायरा और विस्तार क्या है?
  • अनुच्छेद 25(2)(बी) में आये वाक्यांश हिंदुओं के वर्ग का क्या अर्थ है?
  • क्या कोई ऐसा व्यक्ति जो किसी धार्मिक संप्रदाय या धार्मिक समूह से संबंधित नहीं है, जनहित याचिका दायर करके धार्मिक संप्रदाय या धार्मिक समूह की किसी प्रथा पर सवाल उठा सकता है?

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