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Sadhvi Prem Baisa Death : न अर्थी सजती है, न चिता जलती है, ऐसे होता है 'साध्‍वियों' का दाह संस्‍कार

25 वर्षीय साध्वी प्रेम बाईसा की रहस्यमयी मौत के बाद उनके दाह संस्कार नहीं, बल्कि समाधि दिए जाने को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। आखिर साध्वियों की न अर्थी सजती है और न ही चिता जलाई जाती है। इस लेख में जानिए साध्वी प्रेम बाईसा को कैसे दी गई समाधि, इसके पीछे धार्मिक मान्यताएं, शास्त्रों का क्या कहना है और साधु-संतों के अंतिम संस्कार की परंपरा का पूरा अर्थ।
Editorial
Updated:- 2026-02-02, 16:53 IST

25 बरस की साध्‍वी प्रेम बाईसा की रहस्‍यमयी मौत के बाद अब लोग उनके अंतिम संस्‍कार की प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े कर रहे हैं। 30 जनवरी 2026 को उनका पैतृक गांव परेऊ में दाह संस्‍कार होना था, मगर उसकी जगह उन्‍हें समाधि दी गई। ऐसा क्‍यों हुआ? इस पर अब बड़े-बड़े सवाल उठ रहे हैं कि आखिर उनका दाह संस्‍कार क्‍यों नहीं किया गया।

प्रेम बाईसा को कैसे दी गई समाधी?

आमतौर पर हिंदू धर्म में जब व्‍यक्ति की मृत्‍यु हो जाती है, तो उसका दाह संस्‍कार किया जाता है और अग्नि के हवाले कर दिया जाता है, ताकि उसका शरीर पंचतत्‍व में विलीन हो जाए। मगर साध्वियों, साधुओं और संतों के शरीर को समाधी दी जाती है। ऐसा इसलिए किया जाता है क्‍योंकि दाह संस्‍कार कर हम मृत व्‍यक्ति को सांसारिक मोह-माया से छुटकारा दिलाते हैं, वहीं साधू-संतों को इसकी आवश्‍यकता नहीं होती है, वो पहले ही मोह-माया को पीछे छोड़ चुके होते हैं। इसलिए उन्‍हें सम्‍मान देने के लिए और सदैव व अपने भक्‍तों के मध्‍य प्रेरणा बनकर रह सकें, इसके लिए उन्‍हें समाधी दी जाती है।

sadhvi samadhi tradition

प्रेम बाईसा को भी समाधी दी गई थी और उनके पार्थिव शरीर को समाधी के आसन में बैठाकर सारी रीतियां निभाई गई थीं। इसके कई वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं। जिनमें साफ देखा जा सकता है कि साध्वियों की न तो अर्थी सजती है, न चिता लगाई जाती है। उन्‍हें जमीन के नीचे समाधी लिए गाड़ दिया जाता है और उसी स्‍थान पर उनकी समाधी बनाई जाती है।

समाधी के दौरान न कोई रोता है और न किसी तरह का कोई विलाप करता है। साध्‍वी की समाधी के वक्‍त भी लोग भजन कीर्तन करते नजर आए। समाधी के लिए एक कुंआ सा गढ्ढा खोदा गया और फिर उसमें उन्‍हें नीचे बैठाकर अंतिम विदाई दी गई। इसी गढ्ढे को भरकर ऊपर से एक कच्‍चा चबूतरा बना दिया गया, जो अब से प्रेम बाईसा की समाधी कहलाएगा।

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क्‍या कहते हैं शास्‍त्र?

शास्‍त्रों में ऐसा माना गया है कि दह को जलाने की अपेक्षा, जिन मनुष्‍यों की दह को समाधी दी जाती है, उन्‍हें तुरंत ही मोक्ष प्राप्‍त हो जाता है। इस बारे में हमारी बातचीत उज्‍जैन के ज्‍योतिषाचार्य एवं पंडित मनीष शर्मा से हुई। वह कहते हैं, "साधू-संतों का जीवन सरल नहीं होता है। आपने आसपास इतना कुछ आधुनिक देखने के बाद भी जीवन की मोह-माया से खुद को दूर रख पाना बेहद मुश्किल है, मगर जो व्‍यक्ति ऐसा कर पाता है उसे ईश्‍वर के घर का द्वार प्राप्‍त होता है। ऐसे लोगों को सम्‍मान देने के उद्देश्‍य से उनके शरीर को जलाने की स्‍थान पर समाधी दी जाती है, ताकि उनका अस्तित्‍व पृथ्‍वी पर हमेशा बना रहे।"

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