why is goddess kali worshipped only at night

रात के समय ही क्यों होती है काली मां की पूजा? आपकी सोच से बहुत ज्यादा गहरी है इसकी वजह

शास्त्रों के अनुसार, मां काली समय की अधिष्ठात्री देवी हैं जो सृष्टि के विनाश और पुनर्जन्म का प्रतीक हैं। रात के अंधेरे में जब पूरी दुनिया सोती है तब साधक अपनी आंतरिक बुराइयों और भय पर विजय पाने के लिए काली मां की शरण में जाता है।
Editorial
Updated:- 2026-01-31, 10:32 IST

हिंदू धर्म और तंत्र शास्त्र में मां काली की पूजा का समय 'निशिता काल' यानी मध्यरात्रि माना गया है। काली शब्द का अर्थ ही 'काल' और 'अंधकार' से है। ज्योतिष और आध्यात्मिक दृष्टि से रात का समय शांत और एकाग्र होता है जो मां काली की प्रचंड ऊर्जा को आत्मसात करने के लिए उपयुक्त है। शास्त्रों के अनुसार, मां काली समय की अधिष्ठात्री देवी हैं जो सृष्टि के विनाश और पुनर्जन्म का प्रतीक हैं। रात के अंधेरे में जब पूरी दुनिया सोती है तब साधक अपनी आंतरिक बुराइयों और भय पर विजय पाने के लिए काली मां की शरण में जाता है। हालांकि, कई बात ऐसे प्रश्न उठत हैं कि क्या काली मां की पूजा दिन में नहीं कर सकते? क्या जैसे अन्य देवी-देवताओं की पूजा दिन में होती है वैसे ही मां काली की पूजा दिन में नहीं हो सकती है? आइयेजनाते हैं इन सवालों के जवाब वृंदावन के ज्योतिषाचार्य राधाकांत वत्स से।

मां काली की पूजा रात में ही क्यों होती है?

मां काली को 'काल' की शक्ति माना जाता है। काल का स्वभाव अंतहीन और अंधकारमय है जैसे ब्रह्मांड का शून्य। जिस तरह रात के अंधेरे में सब कुछ विलीन हो जाता है, उसी तरह मां काली भी संसार के समस्त पापों और विकारों को अपने भीतर समाहित कर लेती हैं। तंत्र शास्त्र के अनुसार, रात के समय ब्रह्मांडीय ऊर्जा अपने चरम पर होती है।

raat mein hi kyu hoti hai maa kali ki puja

इस समय की गई पूजा सीधे जातक के अवचेतन मन पर प्रहार करती है जिससे उसे भय, क्रोध और अज्ञानता से मुक्ति मिलती है। अंधकार को अक्सर अज्ञान और नकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है। रात के समय तामसिक शक्तियां सक्रिय होती हैं। मां काली की रात में पूजा करने का एक मुख्य कारण इन नकारात्मक ऊर्जाओं को नियंत्रित करना है। 

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जब साधक रात के सन्नाटे में मां की उपासना करता है तो वह अपने भीतर के 'अंधकार' को मां के चरणों में अर्पित कर देता है। काली मां संहार की देवी हैं, लेकिन वे केवल बुराई का संहार करती हैं ताकि अच्छाई का जन्म हो सके। इसलिए, रात की शांति में उनकी पूजा का फल शीघ्र और शक्तिशाली माना गया है। इसका आध्यात्मिक दृष्टिकोण भी है।

रात का समय विकर्षण यानी कि डिस्ट्रैकशन से मुक्त होता है। दिन की कोलाहल और शोर-शराबे में मन को एकाग्र करना कठिन होता है जबकि रात की नीरवता में साधक और ईश्वरीय शक्ति के बीच का संबंध प्रगाढ़ होता है। मां काली की पूजा अक्सर गुप्त और तांत्रिक विधियों से की जाती है जिसके लिए एकांत बहुत अधिक अनिवार्य माना गया है।

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अंधेरी रात के बाद ही सवेरा होता है। मां काली की रात में पूजा इस शाश्वत सत्य को दर्शाती है कि मृत्यु के बाद ही नया जीवन संभव है। वे काल का अंत भी हैं और नई शुरुआत भी। उनकी पूजा का समय यह याद दिलाता है कि जब हमारे जीवन में दुखों का घना अंधकार छा जाए तब भी उनकी भक्ति की लौ हमें मोक्ष और प्रकाश की ओर ले जा सकती है।

raat mein hi kyu ki jati hai maa kali ki puja

एक बात स्पष्ट जान लें कि शास्त्रों में मां काली की पूजा गृहस्थ लोगों के लिए सख्त मना है क्योंकि मां काली मा पार्वती का रौद्र स्वरूप हैं और रौद्र स्वरूप के तेज एवं उनकी शक्ति को साध पाना किसी भी गृहस्थी के बस की बात नहीं है। इसलिए मां काली की पूजा किसी भी गृहस्थी को नहीं करनी चाहिए। इसलिए, मां काली की पूजा तांत्रिक शैली में आती है।

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