
वरुथिनी एकादशी को किसी भी एकादशी की तरह बहुत खास माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि यह एकादशी बहुत पुण्यदायी होती है। यह विशेष रूप से भगवान विष्णु की पूजा के लिए समर्पित होती है। यह एकादशी वैशाख महीने के कृष्ण पक्ष के ग्यारहवें दिन पड़ती है और इसे सभी प्रकार के आशीर्वाद प्रदान करने वाली तिथि के रूप में जाना जाता है। वरुथिनी शब्द का अर्थ ही है वह जो रक्षण करे और मनोकामनाओं की पूर्ति करे। ऐसी मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत रखने के साथ वरुथिनी एकादशी की कथा का पाठ करने से व्यक्ति के जीवन की सभी नकारात्मक ऊर्जाएं दूर होती हैं और उसे आध्यात्मिक मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है। इस दिन का व्रत करने वालों के जीवन में आने वाली कोई भी समस्या जल्दी ही दूर होती है और समृद्धि बनी रहती है। इस एकादशी की व्रत कथा का पाठ करना या कथा को सुनना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। आइए यहां विस्तार से जानें वरुथिनी एकादशी की व्रत कथा के बारे में।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार एक बार नारद मुनि राजा बहुलाव से संवाद कर रहे थे और उस समय भी नारद मुनि एकादशी व्रत की महिमा का गान करते हुए कहते हैं कि जो मनुष्य शुद्ध भक्ति भाव से एकादशी व्रत का पालन करता है, वह अपने मातृ कुल की 10 पीढ़ियों, पितृ कुल की 10 पीढ़ियों और पत्नी के कुल की 10 पीढ़ियों का उद्धार कर सकता है।इन सभी एकादशी तिथियों में से एक है वरुथिनी एकदशी जो सभी वरों को प्रदान करने में सक्षम है और जो समस्त भौतिक बंधनों को दूर करके आध्यात्मिक मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। प्रत्येक मनुष्य के मन में कोई ना कोई इच्छा अवश्य होती है, लेकिन यह इच्छा यदि भौतिक सुखों को प्राप्त करने की होती है तो वह अंत में दुखों का कारण बनती है। वहीं यदि यह इच्छा और अभिलाषा आध्यात्मिक हो भगवान की सेवा करने की हो तो वह व्यक्ति को परम सुख प्रदान करती है।
भौतिक इच्छाएं और उससे अर्जित फल इस भौतिक शरीर के साथ समाप्त हो जाते हैं, लेकिन आध्यात्मिक फल आत्मा के साथ सदैव रहते हैं क्योंकि आत्मा अविनाशी और अमर है। ऐसा कहा गया है कि जो भी व्यक्ति पूर्ण भक्ति भाव से और एकाग्रचित्त होकर इस संपूर्ण कथा का पाठ करता है या इस कथा को सुनता है उसे वरुथिनी एकादशी पूजा का पूर्ण फल मिलता है। वरुथिनी एकादशी की व्रत कथा के अनुसार एक बार जब द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण ने धरती पर अवतार लिया तब उस समय उनके साथ पांच पांडवों के रूप में उनके पार्षद भी थे। पांच पांडवों में सबसे श्रेष्ठ है युधिष्ठिर महाराज थे। उन्हें धर्मराज कहा जाता है। एक दिन युधिष्ठिर महाराज भगवान श्री कृष्ण के साथ बैठे हुए थे और उनके मध्य एकादशी व्रत के बारे में चर्चा हो रही थी। युधिष्ठिर महाराज ने श्री कृष्ण से उस समय पूछा कि 'हे केशव वैशाख मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी का नाम वरुथिनी है। यह तो मैं जानता हूं, लेकिन क्या आप मुझे यह बता सकते हैं कि इस एकादशी के व्रत पालन से क्या लाभ प्राप्त होता है और इसका महत्व क्या है? भगवान श्री कृष्ण ने कहा हे धर्मराज यह ऐसी विशेष एकादशी तिथि है जिसका पालन करने से इस जन्म और अगले जन्म में भी सौभाग्य मिलता है। इतना ही नहीं हर एक जन्म में इस एकादशी व्रत का पालन करने से व्यक्ति वास्तविक गंतव्य को प्राप्त करते हुए इस जन्म मृत्यु के चक्र से हमेशा के लिए मुक्त हो जाता है और आध्यात्मिक लोक को प्राप्त करता है।

यह वही एकादशी तिथि है जिसका पालन करने से महान राजा मानधाता को मुक्ति मिली थी। एक समय की बात है जब शिवाकु वंश के महान राजा त्रिशंकु थे। उनके पुत्र का नाम था धुंधुमार। राजा धुंधुमार अत्यंत पराक्रमी, तेजस्वी और भगवान के भक्त थे, लेकिन एक दिन उन्हें शिव जी से श्राप मिला और उसके कारण उन्हें कुष्ठ रोग हो गया। उस समय जैसे ही राजा धुंधुमार को वरुथिनी एकादशी के महात्मय के विषय में ज्ञात हुआ उन्होंने इस वरुथिनी एकादशी का नियम पूर्वक पालन किया और वरुथिनी एकादशी व्रत का पालन करने से राजा धुंधुमाल कुष्ठ रोग से मुक्त हो गए और वो परम आध्यात्मिक गति को प्राप्त हुए। ऐसा कहा जाता है कि वरुथिनी एकादशी का पालन करने से दस हजार वर्षों की तपस्या का फल मिलता है।
इस प्रकार जो भी वरुथिनी एकादशी के दिन व्रत करने के साथ इस व्रत कथा का पाठ करता है उसके जीवन की सभी बाधाएं दूर होती हैं और जीवन में खुशहाली बनी रहती है। अगर आपको यह स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।
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