
महाभारत की कथा अधर्म पर धर्म की विजय का सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां कुरुक्षेत्र के युद्ध में कौरवों के पूरे कुल का विनाश हो गया था, लेकिन सौ भाइयों की इस भीड़ में एक ऐसा नाम भी था जिसने अधर्म के बीच रहकर भी धर्म का साथ दिया। जब भरी सभा में दुर्योधन और दुशासन द्रौपदी का अपमान कर रहे थे, तब भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य और धृतराष्ट्र जैसे दिग्गज मौन थे। उस समय एक अकेले कौरव भाई ने अपनी आवाज उठाई थी। इस साहस और न्यायप्रियता के कारण ही उस कौरव को पांडवों ने युद्ध में नहीं मारा था। आइये जानते हैं इस बारे में वृंदावन के ज्योतिषाचार्य राधाकांत वत्स से।
वह कौरव भाई जिसने द्रौपदी के चीर हरण का विरोध किया था, उसका नाम विकर्ण था। विकर्ण धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों में से एक था, लेकिन उसका चरित्र अपने अन्य भाइयों विशेषकर दुर्योधन से बिल्कुल अलग था। उसे महाभारत का 'न्यायप्रिय कौरव' कहा जाता है। जब द्युत क्रीड़ा के खेल में द्रौपदी को दांव पर लगाया गया और अपमानित किया गया तो विकर्ण ने इसे शास्त्रों और मानवता के विरुद्ध बताया था।

जब दुशासन द्रौपदी को सभा में खींचकर लाया तो द्रौपदी ने वहां उपस्थित सभी बड़ों से प्रश्न किया कि 'क्या उसे दांव पर लगाना उचित था?' उस समय सभी मौन रहे, लेकिन विकर्ण ने खड़े होकर साफ शब्दों में कहा कि 'यह पूरी तरह से अधर्म है।' उसने तर्क दिया कि युधिष्ठिर स्वयं को हारने के बाद अपनी पत्नी को दांव पर लगाने का अधिकार खो चुके थे।
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विकर्ण की इस हिम्मत ने कर्ण और दुर्योधन को क्रोधित कर दिया था। फिर भी उसने अपने भाइयों की नाराजगी की परवाह किए बिना सच का साथ दिया। प्रचलित कथाओं के अनुसार, विकर्ण इकलौता ऐसा कौरव था जिसे पांडव मारना नहीं चाहते थे क्योंकि वे उसकी धार्मिकता का सम्मान करते थे। कुरुक्षेत्र के युद्ध में जब विकर्ण का सामना भीम से हुआ तो भीम बहुत दुखी थे।

भीम ने कहा, 'हे विकर्ण! मैं जानता हूं कि तुम धर्मात्मा हो, लेकिन मुझे अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए तुम्हें मारना होगा।' युद्ध के मैदान में विकर्ण और भीम का बहुत भयंकर युद्ध छिड़ा लेकिन श्री कृष्ण ने इस युद्ध को रोक दिया। श्री कृष्ण के कहने पर विकर्ण ने महाभारत युद्ध को त्याग दिया था और वन में तपस्या करने के लिए चले गए थे। बाद में विकर्ण ने तपस्या के समय ही अपना शरीर त्याग दिया था।
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अक्सर लोग विकर्ण और युयुत्सु के बीच भ्रमित हो जाते हैं। विकर्ण वह था जिसने द्रौपदी का पक्ष लिया था जबकि युयुत्सु धृतराष्ट्र का वह पुत्र था जिसने युद्ध शुरू होने से ठीक पहले पाण्डवों का साथ देने का निर्णय लिया था। युयुत्सु ने अधर्म का त्याग कर धर्म की ओर से युद्ध लड़ा, इसलिए वह कुरुक्षेत्र के युद्ध में जीवित बचा। इसके अनुसार, 100 में से 98 कौरवों का वध पांडवों द्वारा हुआ था और बाकी 2 अन्य ने अपना शरीर स्वयं त्यागा था।
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