
आज शुक्रवार, 13 फरवरी 2026 का दिन विजय और सफलता का प्रतीक है। आज फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि है, जिसे विजया एकादशी के नाम से जाना जाता है। पद्म पुराण के अनुसार, भगवान राम ने लंका पर चढ़ाई करने से पहले सागर तट पर इसी एकादशी का व्रत किया था, जिससे उन्हें रावण पर विजय प्राप्त हुई थी। इसलिए यह व्रत कोर्ट-कचहरी, शत्रु नाश और कठिन कार्यों में जीत के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। आज दोपहर 04:13 बजे तक मूल नक्षत्र रहेगा, जो गंडमूल श्रेणी का प्रमुख नक्षत्र है। मूल के स्वामी केतु हैं और देवी निरृति हैं। शुक्रवार और एकादशी का संयोग लक्ष्मी-नारायण योग बनाता है, लेकिन मूल नक्षत्र और व्यतिपात योग होने से आज विशेष सावधानी और सात्विकता की आवश्यकता है। आज चंद्रमा धनु राशि में रहेंगे। आइए जानते हैं मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित सौरभ त्रिपाठी से आज का पंचांग और उपाय।

| तिथि | नक्षत्र | दिन/वार | योग | करण |
| एकादशी (दोपहर 02:29 बजे तक) | मूल | शुक्रवार | वज्र | बव |
| प्रहर | समय |
| सूर्योदय | सुबह 06 बजकर 44 मिनट पर होगा |
| सूर्यास्त | शाम 06 बजकर 15 मिनट पर होगा |
| चंद्रोदय | रात 04 बजकर 26 मिनट पर होगा |
| चंद्रास्त | सुबह 02 बजकर 11 मिनट पर होगा |
| मुहूर्त नाम | मुहूर्त समय |
| ब्रह्म मुहूर्त | (सूर्य पूजन का शुभ समय) सुबह 05 बजकर 08 मिनट से 05 बजकर 56 मिनट तक |
| अभिजीत मुहूर्त | (सूर्य पूजन का शुभ समय) दोपहर 12 बजकर 02 मिनट से 01 बजकर 47 मिनट तक |
| विजय मुहूर्त | दोपहर 02 बजकर 43 मिनट से 03 बजकर 28 मिनट तक |
| गोधूलि मुहूर्त | शाम 06 बजकर 15 मिनट से 06 बजकर 41 मिनट तक |
| मुहूर्त नाम | मुहूर्त समय |
| राहु काल | सुबह 11 बजकर 09 मिनट से दोपहर 12 बजकर 33 मिनट तक |
| यमगंड | दोपहर 03 बजकर 23 मिनट से 04 बजकर 49 मिनट तक |
| गुलिक काल | सुबह 08 बजकर 17 मिनट से 09 बजकर 39 मिनट तक |
शुक्रवार को राहु काल सुबह 11:00 बजे से 12:00 बजे के बीच होता है। आज एकादशी व्रत है, इसलिए राहु काल में पूजा का संकल्प न लें।
पद्म पुराण और स्कंद पुराण में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि फाल्गुन कृष्ण पक्ष की यह एकादशी भगवान विष्णु की विशेष कृपा दिलाने वाली मानी गई है और इसका प्रभाव उन लोगों पर अधिक पड़ता है जिनकी कुंडली में शनि, राहु-केतु या छठे-आठवें-बारहवें भाव से जुड़े कष्ट सक्रिय हों। पुराणों में वर्णन आता है कि इस एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति को शत्रु बाधा, मुकदमे, रोग, भय और मानसिक अस्थिरता से मुक्ति मिलती है, ज्योतिषीय दृष्टि से देखा जाए तो एकादशी तिथि चंद्रमा से जुड़ी होती है और चंद्रमा मन, भावनाओं और निर्णय क्षमता का कारक है, इसलिए विजया एकादशी का व्रत चंद्र दोष, मानसिक भ्रम और बार-बार लिए गए गलत निर्णयों से उबरने में सहायक माना गया है। यही कारण है कि युद्ध, प्रतियोगिता, कानूनी विवाद या जीवन के किसी लंबे संघर्ष से पहले इस एकादशी का महत्व बढ़ जाता है, क्योंकि यह मन को स्थिर और संकल्प को मजबूत करती है। पुराण यह भी साफ कहते हैं कि बिना आचरण सुधार के किया गया व्रत निष्फल हो सकता है, इसलिए झूठ, क्रोध, निंदा और अहंकार का त्याग इस दिन विशेष रूप से आवश्यक बताया गया है।
ज्योतिष और शास्त्रों के अनुसार मूल नक्षत्र में शुक्रवार को पड़ने वाली विजया एकादशी का फल यह है कि यह पुराने कर्म, गलत निर्णय और मोह को तोड़कर वास्तविक विजय का मार्ग खोलती है। संयम और शुद्ध आचरण रखने पर शत्रु बाधा, भय और मानसिक उलझनों से मुक्ति मिलती है, जबकि भोग और दिखावे में रहने पर यही योग शुक्र और केतु से जुड़े कष्ट बढ़ा देता है।

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