
कोसा सिल्क को केवल एक कपड़े की नजर से देखने वाले लोगों को इसपर लगने वाली मेहनत पर एक बार नजर डालनी चाहिए। जब आप कोसा सिल्क की हल्की और प्राकृतिक सुनहरी दिखने वाली साड़ी को देखते होंगे, तो आपके दिमाग में आता होगा कि जरूर इसे मशीन से तैयार किया जा रहा होगा, लेकिन ऐसा नहीं है। कई घंटों की मेहनत के बाद कोसा सिल्क से साड़ी तैयार होती है। कोसा सिल्क की कहानी छत्तीसगढ़ के गांव और छोटे कस्बों से शुरू होती है। छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में कोसा सिल्क केवल एक उद्योग नहीं, बल्कि धीरे-धीरे जीवन का आधार बनता जा रहा है। कोसा सिल्क से बनाई जाने वाली साड़ियां महिलाएं सबसे ज्यादा पसंद करती हैं। हमने कोसा सिल्क के बारे में ज्यादा जानकारी जुटाने के लिए कारीगरों और महिलाओं से बात की, तो समझ आया कि यह सिर्फ रेशम नहीं है, बल्कि उनकी घंटों की मेहनत है। आज के इस आर्टिकल में हम कोसा सिल्क के बारे में विस्तार से जानकारी देंगे। कोसा सिल्क कैसे बनता है और इसे कैसे सालों तक स्टोर करके रखा जा सकता है, इसके बारे में आप यहां पढ़ पाएंगी।
कोसा सिल्क केवल एक कपड़ा नहीं है, ऐसा इसलिए क्योंकि यह जंगली रेशम के कीड़ों की मदद से बनता है। टसर कीड़े कोकून बनाते हैं। जब कीड़े अच्चे से विकसित यानी उम्र के हो जाते हैं, तो वे अपने चारों तरफ धागा लपेटकर कोकून बना लेते हैं। इसी कोकून को कई प्रोसेस से गुजारा जाता है, जिसके बाद यह कोसा सिल्क में कन्वर्ट होता है। बिना इसके कोसा सिल्क की साड़ी या कपड़ा तैयार नहीं हो सकता। इसे बनाने का पूरा प्रोसेस हाथों से होता है। इसमें कोई मशीन का यूज नहीं होता, इसलिए इसमें मेहनत ज्यादा लगती है। यही कारण है कि कोसा सिल्क के कपड़े महंगे होते हैं।

महिला कारीगरों ने बताया कि वह हाथ से चलने वाले इस चरखे और लकड़ी की रील की मदद से धागा निकालती हैं। कोकून को उबालने के बाद इसमें से धागे का एक सिरा ढूंढना आसान हो जाता है। इसकी मदद से वह धागा को एक सिरे से पकड़ती हैं और फिर इसे लकड़ी की रील पर लपेटती हैं। इस धागे को बड़े ध्यान से लपेटना पड़ता है, ताकि यह आपस में उलझे नहीं। इसे काफी सावधानी और धैर्य से करना पड़ता है, वरना सारी मेहनत खराब हो जाती है।

कारिगरों ने बताया कि रेशा निकालने के बाद कोसा सिल्क से कपड़ा बनाने की प्रकिया शुरू होती है। पहले यह धागा थोड़ा खुरदरा सा लगता है, इसलिए इसे और साफ किया जाता है ताकि सॉफ्ट हो जाए। इसके बाद धागे को चरखे पर काता जाता है, ताकि यह एक बराबर में आ सके। अगर इसे चरखे पर काता नहीं जाएगा, तो धागा कहीं पतला तो कहीं मोटा होगा।

बाजार में आपको कोसा के कपड़े तरह-तरह के रंगों के मिलेंगे, हालांकि यह कोकून से केवल एक ही रंग का निकलता है। इसके बाद कारीगर इसे पसंद के अनुसार रंग देते हैं, जिसकी वजह से यह बाजार में आपको अलग-अलग रंगों का मिलता है। इसका असली रंग हल्का सुनहरा-भूरा होता है, इसे आप गोल्डन भी कह सकती हैं। यह चमकदार नहीं होता, हल्का फीका लगता है।


कारीगरों ने बताया की लोगों को लगता है कि कोसा सिल्क पर बने डिजाइन मशीन पर छापे जाते हैं, हालांकि ऐसा नहीं है। इसे भी हम हाथों से ही बनाते हैं। इस काम को हाथ करघे यानी हैंडलूम पर बनाते हैं। इसके लिए पहले धागे से साड़ी का कपड़ा तैयार किया जाता है, यानी धाके से बेस स्ट्रक्चर बनाते हैं। कपड़ा तैयार होने के बाद इसपर डिजाइन बनाते हैं। डिजाइन किए जाने वाला धागा, कोसा नहीं होता। इसे नॉर्मल धागे से ही बनाया जाता है।
कोसा सिल्क की अगर सिंपल साड़ी बनाई जा रही है, जिसमें कोई डिजाइन नहीं है, तो इसमें लगभग 24 घंटे यानी 1 दिन का समय लग जाता है। महिला कारीगरों ने कहा कि अगर वह केवल खाने का ब्रेक लेती हैं और लगाता काम करती हैं, तो सिंपल साड़ी तैयार करने में उन्हें लगभग डेढ़ दिन लग जाते हैं। अगर साड़ी डिजाइन वाली है, तो इसमें समय और भी ज्यादा लगता है। साड़ी बनाने का यह समय धागा बनने के बाद का है। धागा निकालने का समय और प्रोसेस अलग है। धागा तैयार होने के बाद साड़ी बनाने में लगभग इतना समय लग जाता है।
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image credit- herzindagi, kosala official
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