
कला और सांस्कृतिक रूप से देश के सबसे समृद्ध राज्य की बात की जाए तो जहन में उत्तर प्रदेश का नाम आता है । सदियों से इस राज्य में विविध कला शैलियों ने अपनी पैठ जमा रखी है। खासतौर पर अवध क्षेत्र की बात की जाए, तो यह स्थान अपनी हस्तशिल्प कला, संगीत, साहित्य और अने कलात्मक विरास्त के लिए विश्व विख्यात रहा है।
अवध क्षेत्र में चिकनकार, आरी-जारदोजी, बादला-मकैश और एप्लिक का काम, जिसे चटपट्टी दस्तकारी भी कहा जाता है, विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। हालांकि, अवध की कुछ कलाओं को विश्व स्तर पर एक अलग पहचान मिली है, वहीं कुछ कला शैलियां ऐसी भी रहीं, जो अब केवल इतिहास के पन्नों में सिमटकर रह गई हैं। ऐसा नहीं है कि उनका अस्तित्व मिट गया हो, मगर अब बहुत कम लोग हैं, जो उस कला के कदरदान हैं और उसके महत्व को समझते हैं। चटपट्टी उन दुर्लभ कलाओं में से एक है।
चटपट्टी एक ऐसी दस्तकारी है, जिसका जन्म बचे हुए कपड़ों की कतरन से हुआ है। यह कला नवाबों के समय की है, जब नवाबी कपड़ों की बची हुई कतरन से बने हुए कपड़ों को चमकाने के लिए इसका उपयोग होता था। यह कपड़े नवाबों के मुलाजिम पहनते थे। इस कला के माध्यम से बेकार कपड़ों की कतरनों को एक नया जीवन दिया जाता था और उन्हें सुंदर वस्त्रों में बदल दिया जाता था।
आज, यह कला अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है, मगर इसके पीछे का इतिहास और इसकी महत्ता अब भी जीवंत है। इस कला की कहानियां और इसके साथ जुड़ा इतिहास आज भी अद्वितीय और प्रेरणादायक हैं, जो हमें अपनी सांस्कृतिक धरोहर की याद दिलाती हैं। चलिए आज हम आपको इस कारिगरी के रोचक इतिहास और इससे जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातों से रू-ब-रू कराते हैं।

चटापट्टी को टुकड़ी का काम भी कहा जाता है। यह हस्तशिल्प कला कपड़ों की बची हुई कतरनों से की जाती है। इस कला में कतरनों की छोटी-छोटी पट्टियां तैयार की जाती हैं और उन्हें आपस में जोड़ कर बड़ा कपड़ा बनाया जाता है। इस जोड़ में फैंसी और चमकीली लेस या गोटा लगाया जाता है, जिससे कपड़ा और भी आकर्षक हो जाता है। इस तरह के कपड़े 4 से 5 या कभी-कभी 7 अलग-अलग रंगों की पट्टियों से मिलकर बने होते हैं, जो इसे रंग-बिरंगा बना देते हैं।
पहले के समय में इस तरह के कपड़े नवाबों के महलों में काम करने वाले नौकर-चाकर पहना करते थे। इन कपड़ों से उनकी पहचान होती थी। वे भीड़ से अलग हटकर नजर आते थे और नवाबों की पोशाकों में इस्तेमाल होने वाले खूबसूरत कारीगरी वाले कपड़ों की कतरन भर से अपना शरीर ढककर खुश हो जाया करते थे।
चटापट्टी की यह कला विशेष रूप से उन लोगों के लिए थी जिनके पास महंगे कपड़े खरीदने के लिए पैसे नहीं होते थे। वे नवाबों और अमीरों के महलों से निकलने वाली कपड़ों की कतरनों को इकट्ठा करके उनसे सुंदर और उपयोगी वस्त्र बना लेते थे। यह एक प्रकार की पुनर्चक्रण की प्रक्रिया थी जो न केवल सस्ती थी बल्कि पर्यावरण के लिए भी लाभकारी थी।

इस कला की खूबसूरती और इसकी उपयोगिता को देखते हुए समय के साथ इसे समाज के अन्य वर्गों ने भी अपनाना शुरू कर दिया। चटापट्टी के कपड़े अब केवल नौकर-चाकरों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि समाज के अन्य लोग भी इन्हें पहनने लगे। आज भी चटापट्टी की यह कला ग्रामीण क्षेत्रों में जीवित है और इसे स्थानीय हाट-बाजारों में देखा जा सकता है।
चटापट्टी के कपड़ों में विभिन्न रंगों और डिजाइनों का मिश्रण होता है, जो इन्हें अनोखा बनाता है। इसमें इस्तेमाल की जाने वाली लेस और गोटा भी विभिन्न प्रकार की होती हैं, जिससे कपड़े की खूबसूरती और बढ़ जाती है। इन कपड़ों को बनाने में विशेष प्रकार की सुई और धागे का उपयोग किया जाता है, जो इसे मजबूत और टिकाऊ बनाता है।
चटापट्टी की इस कला को सिखाने और इसे जीवित रखने के लिए कई प्रशिक्षण कार्यक्रम और कार्यशालाएं भी आयोजित की जाती हैं। यह न केवल एक हस्तशिल्प कला है बल्कि यह उन महिलाओं के लिए भी रोजगार का साधन बन गया है जो अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को सुधारने में योगदान दे रही हैं।

आज के समय में चटापट्टी को एप्लिक वर्क या पैचवर्क के रूप में जाना जाता है। बड़े डिज़ाइनर अपने संग्रह में मल्टी कलर और रंगीन पैटर्न के आउटफिट्स पेश करते हैं, जिनमें खूबसूरत चटापट्टी का काम देखने को मिलता है। यह कहना उचित होगा कि यह कला आज भी अस्तित्व में है। विशेष रूप से जब हम फैशन सस्टेनेबिलिटी की बात करते हैं, तो चटापट्टी का काम सबसे पहले ध्यान में आता है।
आज के फैशन डिजाइनर पुराने कपड़ों को रिसायकल करके नए आउटफिट बना रहे हैं और नए ट्रेंड सेट कर रहे हैं, जिसमें पैच या एप्लिक तकनीक का उपयोग करके पुराने और नए कपड़ों को जोड़कर एक नया आउटफिट तैयार किया जाता है। इस प्रकार, यह न केवल पर्यावरण के लिए लाभकारी है, बल्कि फैशन में भी एक नया और आकर्षक दृष्टिकोण प्रदान करता है।
अधिकांश इस शैली का उपयोग एथनिक और ट्रेडिशनल लुक वाले आउटफिट्स के लिए किया जाता है। चटापट्टी का काम, जिसे एप्लिक या पैचवर्क के रूप में भी जाना जाता है, एक पुरानी तकनीक है जो आज भी प्रासंगिक है। यह तकनीक न केवल पुराने कपड़ों को एक नया जीवन देती है, बल्कि उन्हें फैशनेबल और आधुनिक बनाती है।
इस प्रकार के आउटफिट्स में रंगों और पैटर्न का ऐसा मिश्रण होता है जो उन्हें विशेष और अद्वितीय बनाता है। इस प्रक्रिया में विभिन्न रंगों और कपड़ों के टुकड़ों को जोड़कर एक नया डिज़ाइन तैयार किया जाता है, जो देखने में सुंदर और आकर्षक होता है।
चटापट्टी का काम न केवल एक कला है, बल्कि यह फैशन की दुनिया में एक महत्वपूर्ण योगदान भी देता है। यह पुराने कपड़ों को पुनर्जीवित करके उन्हें एक नया और अनूठा रूप प्रदान करता है, जो फैशन के साथ-साथ पर्यावरण के लिए भी लाभकारी है।
इस लिहाज से कहा जा सकता है कि चटापट्टी की यह कला न केवल इतिहास की एक धरोहर है बल्कि यह आज भी प्रासंगिक है और इसे संरक्षित करने की आवश्यकता है। इसके माध्यम से न केवल पुरानी कतरनों का उपयोग हो रहा है बल्कि इससे नए और सुंदर आउटफिट्स भी तैयार किए जा सकते हैं।
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