Sat Mar 21, 2026 | Updated 05:18 AM IST HZ Awards 2026
श्री राधा चालीसा

श्री राधा चालीसा

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दोहा
श्री राधे वुषभानुजा, भक्तनि प्राणाधार ।
वृन्दाविपिन विहारिणी, प्रानावौ बारम्बार ॥
 
जैसो तैसो रावरौ, कृष्ण प्रिया सुखधाम ।
चरण शरण निज दीजिये, सुंदर सुखद ललाम ॥
 
चौपाई
जय वृषभान कुंवरी श्री श्यामा । कीरति नंदिनी शोभा धामा ॥
नित्य विहारिनि श्याम अधारा । अमित मोद मंगल दातारा ॥
 
रास विलासिनि रस विस्तारिनि । सहचरि सुभग यूथ मन भावनि ॥
नित्य किशोरी राधा गोरी । श्याम प्राणधन अति जिय भोरी ॥
 
करुणा सागर हिय उमंगिनी । ललितादिक सखियन की संगिनी ॥
दिनकर कन्या कूल विहारिनि । कृष्ण प्राण प्रिय हिय हुलसावनि ॥
 
नित्य श्याम तुमरौ गुण गावैं । राधा राधा कहि हरषावैं ॥
मुरली में नित नाम उचारें । तुव कारण लीला वपु धारें ॥
 
प्रेम स्वरूपिणि अति सुकुमारी । श्याम प्रिया वृषभानु दुलारी ॥
नवल किशोरी अति छवि धामा । द्युति लघु लगै कोटि रति कामा ॥
 
गौरांगी शशि निंदक बदना । सुभग चपल अनियारे नयना ॥
जावक युत युग पंकज चरना । नूपुर धुनि प्रीतम मन हरना ॥
 
संतत सहचरि सेवा करहीं । महा मोद मंगल मन भरहीं ॥
रसिकन जीवन प्राण अधारा । राधा नाम सकल सुख सारा ॥
 
अगम अगोचर नित्य स्वरूपा । ध्यान धरत निशिदिन ब्रज भूपा ॥
उपजेउ जासु अंश गुण खानी । कोटिन उमा रमा ब्रह्मानी ॥
 
नित्य धाम गोलोक विहारिणि । जन रक्षक दुख दोष नसावनि ॥
शिव अज मुनि सनकादिक नारद । पार न पाइ शेष अरु शारद ॥
 
राधा शुभ गुण रूप उजारी । निरखि प्रसन्न होत बनवारी ॥
ब्रज जीवन धन राधा रानी । महिमा अमित न जाय बखानी ॥
 
प्रीतम संग देइ गलबांही । बिहरत नित वृन्दावन मांही ॥
राधा कृष्ण कृष्ण कहैं राधा । एक रूप दोउ प्रीति अगाधा ॥
 
श्री राधा मोहन मन हरनी । जन सुख दायक प्रफुलित बदनी ॥
कोटिक रूप धरें नंद नंदा । दर्शन करन हित गोकुल चंदा ॥
 
रास केलि करि तुम्हें रिझावें । मान करौ जब अति दुःख पावें ॥
प्रफुलित होत दर्श जब पावें । विविध भांति नित विनय सुनावें ॥
 
वृन्दारण्य विहारिणि श्यामा । नाम लेत पूरण सब कामा ॥
कोटिन यज्ञ तपस्या करहु । विविध नेम व्रत हिय में धरहु ॥
 
तऊ न श्याम भक्तहिं अपनावें । जब लगि राधा नाम न गावें ॥
वृन्दाविपिन स्वामिनी राधा । लीला वपु तब अमित अगाधा ॥
 
स्वयं कृष्ण पावैं नहिं पारा । और तुम्हें को जानन हारा ॥
श्री राधा रस प्रीति अभेदा । सादर गान करत नित वेदा ॥
 
राधा त्यागि कृष्ण को भजिहैं । ते सपनेहुं जग जलधि न तरि हैं ॥
कीरति कुंवरि लाड़िली राधा । सुमिरत सकल मिटहिं भव बाधा ॥
 
नाम अमंगल मूल नसावन । त्रिविध ताप हर हरि मनभावन ॥
राधा नाम लेइ जो कोई । सहजहि दामोदर बस होई ॥
 
राधा नाम परम सुखदाई । भजतहिं कृपा करहिं यदुराई ॥
यशुमति नन्दन पीछे फिरिहैं । जो कोऊ राधा नाम सुमिरिहैं ॥
 
रास विहारिणि श्यामा प्यारी । करहु कृपा बरसाने वारी ॥
वृन्दावन है शरण तिहारी । जय जय जय वृषभानु दुलारी ॥
 
दोहा
श्री राधा सर्वेश्वरी, रसिकेश्वर धनश्याम ।
करहुं निरंतर बास मैं, श्री वृन्दावन धाम ॥
 
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