
अकाल मृत्यु वह होती है जब किसी व्यक्ति की मृत्यु असमय किसी दुर्घटना या अचकनक किसी कारणवश हो जाती है। ऐसे में उस व्यक्ति के प्रियजनों के मन में कई सवाल उठते हैं कि क्या उन्हें मोक्ष मिल पाएगा? क्या उस व्यक्ति की आत्मा को संतुष्टि मिलेगी? कहीं ऐसे व्यक्ति के घर में किसी तरह का पितृ दोष तो नहीं होगा? कई लोगों का मानना यह भी होता है कि ऐसे व्यक्ति की आत्मा अतृप्त रूप में भटकती रहती है। इस गहन प्रश्न का उत्तर जानने के लिए एक भक्त ने परमानंद जी महाराज से पूछा कि क्या अकाल मृत्यु होने पर आत्मा को शांति नहीं मिलती है? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए प्रेमानंद जी महाराज बड़े ही सहज भाव से बोलते हैं कि ऐसा मानना सही नहीं है। आइए यहां विस्तार से जानें इस सवाल के सही उत्तर और प्रेमानंद जी के मत के बारे में।

प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार, यह मान लेना कि एक्सीडेंट या अकाल मृत्यु होने से आत्मा को मुक्ति नहीं मिलती है ऐसा कहना सही नहीं होगा। प्रेमानंद जी उदाहरण देते हुए कहते हैं कि कई बड़े संतों की भी दुर्घटना में मृत्यु हो जाती है, लेकिन इससे उनकी आत्मा की उन्नति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है और यह कहना भी ठीक नहीं है कि उनकी आत्मा को शांति या मोक्ष नहीं मिला है। किसी भी व्यक्ति के लिए मृत्यु कैसे हुई, यह महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि उसने जीवन कैसा जिया गया, यह जरूरी होता है और यही मृत्योपरांत मोक्ष का कारण बनता है। यदि किसी व्यक्ति ने धर्म, सेवा, भजन और सत्कर्मों में अपना जीवन बिताया है और उसकी अकाल मृत्यु हो जाए तो यह उसके कल्याण में बाधक नहीं बनती है। वहीं यदि कोई व्यक्ति पाप कर्म करता है और उसकी समय से भी मृत्यु हो तो मोक्ष नहीं मिलता है।
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प्रेमानंद जी कहते हैं कि जब किसी की कम उम्र में मृत्यु हो जाती है तो हम अक्सर कहते हैं कि अभी उम्र ही क्या थी? यदि हम संतों की मानें तो मृत्यु का समय पूर्व निश्चित होता है। जिसे हम अकाल कहते हैं, वह भी दरअसल ईश्वर की ही योजना का एक हिस्सा होता है। यदि किसी की मृत्यु युवावस्था में दुर्घटना से हो जाती है, तो वह भी उसके पूर्व कर्मों का ही परिणाम हो सकता है। परंतु यह नहीं कहा जा सकता कि ऐसी मृत्यु से उसकी आत्मा को शांति नहीं मिलेगी। यदि उसका जीवन भगवान के स्मरण में बीता है, तो आमा को शांति और मोक्ष अवश्य मिलता है।
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प्रेमानंद जी महाराज एक और महत्वपूर्ण बात बताते हैं कि यदि अंतिम समय में ईश्वर का नाम स्मरण हो जाए, तो भी जीवन का परिणाम बदल सकता है। भले ही जीवन में आपसे भूलें हुई हों, लेकिन यदि मृत्यु के समय राम, राधा, कृष्ण या हरि का नाम निकल जाए, तो ईश्वर की कृपा से आत्मा का कल्याण संभव है। इसलिए वे नाम-जप को सबसे बड़ा साधन बताते हैं। भागवत पुराण की कथा का उल्लेख करते हुए राजा चित्रकेतु का उदाहरण देते हैं। पुत्र प्राप्ति के बाद जब पुत्र की मृत्यु हो गई, तो वे शोक में डूब गए। तब नारद मुनि ने मृत बालक की आत्मा को बुलाकर पूछा कि तुम्हारे माता-पिता रो रहे हैं, क्या तुम लौटना चाहोगे?
उस समय आत्मा ने उत्तर दिया कि वह किसी का पुत्र नहीं है बल्कि अपने कर्मों का फल भोगने आया था।
प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार अकाल मृत्यु होने पर आत्मा के मोक्ष मिलने का कोई संबंध नहीं है और आत्मा की शांति के लिए व्यक्ति के कर्म निर्भर करते हैं। आपको यह स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसे ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।
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